Let’s Combat Cancer!

In the urban lifestyle of our respective cities, we often have an encounter with headaches, fever, cold and cough, etc. We always hope to get well soon and get back to normal. Though we know it won’t last for long and we will get back to normal with some medication. Imagine the sorry state of people who have to live with this hope for years long. Such is the state of the cancer patients worldwide. Everyday fighting with death and hoping to get well soon, is not an easy task. According to us all the cancer patients worldwide are true warriors who battle each day for their lives…

Update: Winners Announced at the bottom of the post!

A motivation is what keeps a soul thriving for life. With this noble thought, BlogAdda calls out to all the bloggers to come and write any inspiring story, narrative, personal anecdotes or an experience that provides hope for those fighting cancer! BlogAdda in association with Indusladies.com announces a contest, ‘Let’s Combat Cancer‘. Here is a chance for all the bloggers to make a difference in someone’s life through their writing and prove that ‘words can speak louder than action’.

  • Tell us if you have or anyone you know have had an encounter with cancer. What did you do then? What were the learnings?
  • Any incident around you which you think by sharing with us can make a difference.
  • You also have the opportunity to bring any cancer patients plea in your blog and who knows the victim might get some helping hand.
  • Any story which is inspiring or heart wrenching.
  • Display (at the top of your blog post) one of the campaign badges that you can gethere

This contest is not about winning but is about making a difference. The top three posts will win goodies from Indusladies.com.

So think on how you can motivate the cancer patients to fight back cancer and survive! Make a difference in someone’s life today and feel the difference in your own life as well!


The winners for this contest are:

You win an Indusladies Cap and a Letter Holder. 🙂


14 Replies to “Let’s Combat Cancer!”

  1. Hi,

    Cancer Is Very Very Big Demon Who Have Sat On People Neck As 40 – 50 % Die Due To Various Types Of Cancer But Still Youngsters Have Not Taken A Lesson Out Of It.

    Let Me Tell You The Fact That Iam A Cancer Patient As I Have A Mouth Cancer And That Devastating Demon Has Already Sat On My Neck And I Want To Live And Not Die But I Know That This Is Not Possible As Iam Facinfg Last Stage.

    So Advice I All The People That Please Do Not Drink, Smoke Or Chew Tobbaco And Do Not Let The Demon Devaste Your Life.

    So Keep Away These Things And Live The Life To The Fullest.

  2. दो कैन्सरग्रस्त रोगियों की आपबीती
    विपिन किशोर सिन्हा
    वे जुलाई १९९५ के दिन थे. मेरी पत्नी – गीतू, जिसकी उम्र मात्र ३५ वर्ष थी, कैन्सर की शिकार हुई. बिना नहाए-धोए और पूजा किए वह अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करती थी. पान, तंबाकू, मदिरा इत्यादि से उसका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था. उसकी बाईं ब्रेस्ट में एक गांठ उभरी. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अस्पताल में उसे दिखाया गया. तरह-तरह के टेस्ट कराए गए. डक्टरों ने इसे कैन्सर घोषित किया और केस टाटा मेओरियल हास्पिटल, मुम्बई को रेफर कर दिया.
    जीवन के सबसे कठिन क्षण थे वो. कैन्सर का नाम सुनते ही दिल बैठ गया, मस्तिष्क चक्कर खाने लगा. जीवन की सबसे प्रिय निधि – लगा – जल्दी ही खोनेवाला हूं. मैं उसे दिलासा दिलाता था – “जल्दी ही ठीक हो जाओगी.” वह कम बोलने लगी थी. बात काटती नहीं थी, लेकिन उसकी आंखें मेरी बातों पर अविश्वास करने लगी थीं. मैं प्रत्यक्ष देख सकता था. उसे दिलासा देते हुए कभी-कभी मैं भी रो पड़ता था. कबतक अभिनय करता? मेरा निर्माण भी हाड़ मांस से ही हुआ था. मेरे अंदर भी भावनाएं उठती थीं.
    “मुझे कैन्सर हुआ है न?” वह पूछती.
    “नहीं ऐसा नहीं है,” मैं उत्तर देता.
    “आपको झूठ बोलना भी नहीं आता. आप होठों से प्रयास तो करते हैं लेकिन चेहरा सारा भेद खोल देता है. मैं अच्छी तरह जानती हूं – टाटा मेमोरियल में और किस रोग की चिकित्सा होती है?”
    उसे अंधेरे में रखना संभव नहीं था लेकिन इस रोग के नाम का उच्चारण करने में रूह कांप जाती थी. हम साथ रोए थे – कई बार – गले लगकर. बिछड़ना ध्रुव सत्य लग रहा था. फिर भी प्रयास तो करना ही था. महासमर में उतरना ही था. हम लोग मुंबई के लिए चल पड़े. हास्पिटल के पास ही ’हरिओम’ होटल में ठहरे हमलोग. डा. पी.बी.देसाई की ओ.पी.डी. में पंजीयन कराया गया. चेक अप के बाद ढेर सारे टेस्ट लिख दिए उन्होंने. एक हफ़्ते तक टेस्ट ही कराते रहे हमलोग. एफ़.एन.ए.सी. टेस्ट से बहुत घबराती थी वह. दो बार यह टेस्ट हो चुका था. रिपोर्ट दिखाई गई, लेकिन टाटा मेमोरियल सिर्फ़ अपनी जांच पर ही भरोसा करता था. एफ़.एन.ए.सी. टेस्ट के लिए जाते समय वह बिलख-बिलख कर रोई थी. मैं उसकी कोई सहयता नहीं कर सका. ढाढ़स बंधाने की भी हिम्मत नहीं रह गई थी मुझमें. वह अंदर गई. आधे घंटे के बाद आंसू पोछते हुए वह टेस्ट लैब से बाहर निकली. मैंने बांहों का सहारा दिया. धीरे-धीरे टैक्सी तक ले आया. होटल पहुंचकर हम दोनों चुप थे. पंखा फुल स्पीड पर चल रहा था. हवा की सांय-सांय की आवाज़ आ रही थी.
    एक हफ़्ते के बाद आपरेशन की डेट मिली. नियत तिथि पर आपरेशन हुआ. डा. देसाई ने बधाई दी. आपरेशन सफल था. मैंने डक्टर के पांव छू लिए उन्होंने गीतू को नई ज़िन्दगी दी थी. टांके सूखने में १५ दिन क समय लगा. फिर फाइनल चेक अप किया गया. कीमोथिरेपी के छः कोर्स पूरा करने की सलाह मिली. अगला पड़ाव बनारस था. हिन्दू विश्वविद्यालय के अस्पताल में यह चिकित्सा शुरू हुई. भयानक आफ्टर इफेक्ट होता है इस थेरेपी का. ड्रिप के सहारे धीरे-धीरे कैन्सर से प्रभावित सेलों को नष्ट करने के लिये दवा चढ़ाई जाती है. दो कीमो में इक्कीस दिनों का गैप होता था. कीमोथिरेपी से कैन्सर से प्रभावित कितने सेल नष्ट होते थे, यह तो नहीं मालूम लेकिन पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ सेल अवश्य नष्ट हो जाते थे. हर कीमो के बाद गीतू एक ज़िन्दा लाश बन जाती थी. अपने पैरों पर खड़ी होने के लिये उसे हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता. किसी तरह कीमो के छः कोर्स पूरे हुए. फिर चेक अप के लिए मुंबई जाना पड़ा. सब ठीक था, लेकिन डाक्टर ने प्रत्येक छः महीनों के बाद मुंबई आकर नियमित चेक अप की सलाह दी. मेरे पूछने पर कि जब वह ठीक हो गई है तो बार-बार चेक अप की क्या आवश्यकता है, डाक्टर ने मुझे अलग ले जाकर बताया – मि. सिन्हा, रोग का फैलाव ज्यादा हो चुका है, इट इस इन एडवांस स्टेज. यू मस्ट रिमेन केयरफुल आल द टाइम. मेरे पैर के नीचे से जमीन खिसकने लगी. मैंने सोचा था कि चक्रव्यूह तोड़ दिया लेकिन ऐसा नहीं था. पहले आपरेशन के अभी सात साल भी नहीं बीते थे कि आपरेशन वाली जगह पर एक गांठ फिर से उभर आई. विपत्ति का पहाड़ पुनः टूट पड़ा. “कितनी और यातना दोगे, कितनी और परीक्षा लोगे”, भगवान से बार-बार पूछा मैंने. लेकिन पत्थर भी कभी बोलता है क्या? गीतू जीवन से निराश हो चुकी थी. बड़ी मुश्किल से उसे पुनः मुंबई चलने के लिए राज़ी किया. टाटा मेमोरियल में ही दूसरा आपरेशन हुआ. रेडियोथेरेपी के तीस कोर्स भी कराने पड़े.
    समय तो कभी रुकता नहीं, आगे बढ़ता ही जाता है. मुंबई प्रवास के ढाई महीने भी गुज़र ही गए. कैसे गुज़रे, याद नहीं करना चाहता. बनारस लौटने के बाद हम फिर अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए लेकिन हमलोग हंसना भूल गए. कैन्सर ने उसके बदन में बसेरा बना लिया था. हमेशा आशंका बनी रहती थी. डर के साए में हम दिन गुजार रहे थे. मैं तनावग्रस्त रहने लगा. रात में नींद नहीं आती थी. अक्सर गोली लेनी पड़ती थी. वज़न भी धीरे-धीरे कम होने लगा. शरीर में मधुमेह ने स्थाई बसेरा बना लिया. २००३ की जनवरी के आते-आते स्टूल के साथ खून का निकलना आरंभ हुआ. हिन्दू विश्वविद्यालय अस्पताल में तरह-तरह की जांच हुई. रेक्टम में एक ट्यूमर डायग्नोस हुआ. केस एस.जी.पी.जी.आई. लखनऊ के लिए रेफर कर दिया गया.
    डाक्टरों ने सफलता पूर्वक मेरा आप्रेशन किया. डेढ़ महीने तक हास्पिटल में भर्ती रहा. वार्ड ब्वाय की गलती के कारण पहले आपरेशन के पांच दिन बाद ही एक इमर्जेंसी आपरेशन और करना पड़ा – इलियास्टमी की गई. पेट की दाईं ओर एक बैग लगा दिया गया. छोटी आंत को बड़ी आंत से अलग कर दिया गया. स्टूल बड़ी आंत में नहीं आता था – बैग में इकठ्ठा होता था. हमने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी. एक सदमा सा लगा. गीतू ने संभाला मुझे, बोली –
    “आप तनिक भी चिन्ता न करें. मैंने नर्स से ट्रेनिंग ले ली है. बैग निकालना, बदलना, लगाना और साफ करना, मैंने सीख लिया है. आपको ज़रा भी तकलीफ़ नहीं होगी. मैं हूं न.”
    मैं राज कपूर की तरह मुस्कुराया. वह मुकेश के ट्रेजडी गाने गाते समय भी हल्के से मुस्कुराता था.
    ट्यूमर की बायप्सी रिपोर्ट तो आ गई थी लेकिन डाक्टर ने उसे डिस्क्लोज नहीं किया था. डिस्चार्ज वाले दिन उसने बताया —
    “ट्यूमर मैलिग्नैंट था, आपको रेडियोथिरेपी और कीमोथिरेपी भी करानी पड़ेगी – यहां भी हो सकती है, बनारस में भी हो सकती है. आपको जहां भी सुविधा हो, दोनों थिरेपी करा लीजिएगा. पूरी रिपोर्ट डिस्चार्ज सर्टिफ़िकेट के साथ मिल जाएगी. विश यू आल द बेस्ट.”
    मैं जड़वत हो गया. दुर्भाग्य कभी अकेले नहीं आता. डिस्चार्ज होने की खुशी समाप्त हो चुकी थी. कमरे में सन्नाटा छा गया. सिर्फ गीतू के फूट-फूटकर रोने की आवाज़ आ रही थी –
    “मैंने क्या बिगाड़ा था भगवान आपका? क्या आपको यह रोग मुझे देकर संतुष्टि नहीं हुई? कोई जरूरी था कि इन्हें भी यह घातक रोग लग जाय? मुझे आपने बचा ही क्यों लिया? मर जाती तो यह बुरी खबर सुनने को तो नहीं मिलती. यह अन्याय है भगवन, सरासर अन्याय है.”
    विह्वल कर देने वाला था उसका करुण क्रन्दन. उपस्थित सभी लोगों की आंखें गीली हो गईं. सबने पलकों पर तिर आए आसुओं को पोंछा. हमलोग बनारस लौट आए. डाक्टर की सलाह के अनुसार भयावह रेडियोथिरेपी और कीमोथिरेपी कराई गई.
    कैन्सर से भयावह इसकी चिकित्सा होती है. पैसा पानी की तरह बहाना पड़ता है. रोगी कई बार मरता है, कई बार जीता है. अवसाद हमेशा हावी रहता है. मृत्यु के आने तक कौन नहीं जीना चाहता है? पर कैन्सर का रोगी जी पाता है क्या? वन-उपवन, तरुवर-लता, कलियां-प्रसून, पपीहा कोयल, शुक-सारिका, मैना-गौरैया, बादल-बिजली, सावन-रिमझिम, सागर-झील, झरनें-नदियां, ताल-तलैया – सबको देखना चाहता है – पर देख पाता है क्या? क्षतिग्रस्त लिपिड, सेल-वेसेल वाल, असन्तुलित न्यूक्लियस, डीएनए, प्रोटीन, रेडियो, कीमो मेडिकेशन, पंचक्रिया, शल्यक्रिया – सबके बावजूद रोगी – हाथ, पांव, मस्तिष्क और दिल, सबका इस्तेमाल करना चाहता है – कर पाता है क्या? मैं अक्सर सोते समय भगवान से प्रार्थना करता था –
    “हे भगवन! अगर मैंने जीवन में कुछ भी पुण्य अर्जित किया हो, तो मुझे कल का सवेरा मत दिखाना. यह जर्जर शरीर अब ढोया नहीं जाता. जीने की आकांक्षा अब शेष नहीं रह गई है. मुझे मुक्ति दे दो, मुझे मुक्ति दे दो.”

    उपर से मैं सामान्य दिखाई देता था लेकिन अंदर से शरीर जर्जर हो चुका था. आंतें सिकुड़ गईं थी. कब्ज़ ने स्थाई रूप धारण कर लिया. दिन में दस-बारह बार शौच जाना पड़ता था लेकिन पेट साफ नहीं होता था. भांति-भांति की दवाएं दी गईं लेकिन सब बेअसर. डाक्टरों ने हार मान ली. मुझे सलाह दी गई – अब ऐसे ही जीना सीखिए. मेरी दक्षता और क्षमता आधी से भी कम हो गई. घर और आफ़िस, यहीं दुनिया थी मेरी. वह मुझे ढाढ़स बंधाती थी और मैं उसे. एक दूसरे की् पीड़ा, एक दूसरे से अधिक कौन समझ सकता था. फिर भी कष्ट बांट हम खुश रहने की कोशिश करते. वह भगवान से एक ही प्रार्थना करती थी कि वे उसे सुहागिन की मृत्यु दें?
    सन २००५ का नवंबर महीना चल रहा था. दिवाली के बाद गीतू को एक दिन तेज खांसी आई. कफ़ में खून के छींटे दिखाई पड़े. बी.एच.यू. में डाक्टर को फौरान दिखाया गया. ढेर सारे टेस्ट कराए गए – सीटी स्कैन, एफ़.एन.ए.सी, एक्सरे, सोनोग्राफी, इत्यादि, इत्यादि. धड़कते दिल से रिपोर्ट ले आता. लैब में जाने से पूर्व संकट मोचन मंदिर में जाकर बजरंग बली के दर्शन करता, रो-रोकर याचना करता – रिपोर्ट सही करना भगवान. लेकिन सब बेकार. सारी रिपोर्टें दिल तोड़ने वाली थीं. रोग का फैलाव दोनों फेफड़ों, राइट ब्रेस्ट और गले में हो चुका था. सर्जरी नहीं की जा सकती थी. कीमोथिरेपी की दारुण यंत्रणा से फिर गुजरना पड़ा. हमदोनों का एकमात्र पुत्र साफ्ट्वेयर इंजीनियर है. बंगलोर में नौकरी कर रहा था. उसकी अंतिम इच्छा थी कि उसकी आंखों के सामने बेटे की शादी हो जाय. इधर कीमो चल रही थी, उधर सुयोग्य बहू की तलाश. कुछ ही दिनों में तलाश पूरी हो गई. दिसम्बर २००६ में बेटे की शादी संपन्न हो गई. अपार इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए उसने शादी की सारी रस्में पूरे उत्साह से निभाई. शादी के बाद एक दिन पूजा के दौरान वह बोली – “हे भगवान! मेरी सारी इच्छाएं पूरी हो गईं. अब जब चाहो, मुझे अपने पास बुला सकते हो.”
    जीवन! क्या होता है जीवन? चैतन्य की एक ओंकार ध्वनि ही तो है यह – पीढ़ी दर पीढ़ी की दीर्घ साधना की संस्कारशील यात्रा से प्राप्त. मनुष्य अपने बुद्धि कौशल से सबकुछ निर्माण कर सकता है लेकिन नहीं जोड़ सकता है एक पल भी अपनी इच्छा से. परन्तु संघर्ष करता है जीवन भर. उसे प्रतीत होता है – कुछ पल तो जोड़ ही सकता है अपने अथक प्रयासों से अपने और अपने प्रियजन के जीवन में. अद्भुत है यह मृग-मरीचिका. ज्ञानी भी अज्ञानी की भांति आचरण करता है.
    गीतू धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही थी. चेहरे पर उभर आई सूजन अब साफ़ देखी जा सकती थी. उसके दाएं हाथ और दाहिने पैर ने अचानक काम करना बंद कर दिया. फिर तरह-तरह के टेस्ट हुए – सीटी स्कैन, बेरियम टेस्ट, सोनोग्राफी……….मस्तिष्क के दक्षिणी भाग में भी रोग की पहुंच हो गई थी. भोजन की नली लगभग बंद हो चुकी थी. हाथ-पांव को क्रियाशील बनाने के लिए रेडियोथिरेपी और भोजन की नली खोलने के लिए डाइलेटेशन का निर्णय लिया गया. मैंने डाक्टर से पूछा –
    “इस ट्रीटमेंट के बाद क्या वह ठीक हो जाएगी?”
    “अब हमलोगों का प्रयास है कि वे जबतक जीएं, कंफर्टेबली जीएं. आप “कहो कौन्तेय” के रचनाकार हैं, महाभारत और गीता के मर्मज्ञ हैं. धैर्य रखिए, हिम्मत रखिए और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहिए.”
    डाक्टर ने संकेत में सब समझा दिया.
    गीतू के शरीर से नियति को इतनी ईर्ष्या क्यों? सुबह होती, रंग फीका-फीका लगता तथापि जीवित रहती – बातचीत करती – पुस्तक पढ़ती – मृत्यु का अनादर करते हुए हंसती – भोर के चांद की तरह. यातना के साथ सूर्योदय होता – सूर्यास्त होता बेचैनी के साथ – रात गुजरती एक-एक निःशब्द, भयंकर, निश्चित प्रतीक्षा में – मृत्यु की. मृत्यु की याचना, मृत्यु का भय, गीतू के सामने बार-बार पराजित होते. दिन रात बेटे-बहू उसके पास बैठे रहते, थके मांदे मेरे साले दीवान के किनारे कुछ पलों के लिए आराम कुर्सी पर निढ़ाल हो जाते, फिर चौंक कर उठ बैठते. मैं लाबी में अस्थिर हो टहलता रहता. सेवम बरामदे में खंभे की टेक लगाए मृत्यु के पथ को रोककर बैठा रहता. सेविका उसकी देखभाल करती. उसके बचे-खुचे बालों को संवारती – मध्य में लाल सिन्दूर की एक रेखा बनाती – ललाट के बीचोबीच एक छोटी सी बिन्दी सजाती. साधारण प्रसाधनों से ही उसका चेहरा मणि की तरह दमक उठता.
    दिनांक ८ मार्च २००७. रात में खाना खाते समय सबने लक्ष्य किया – वह प्रसन्न थी. खाना खिलाकर दवा दी गई. जल्दी ही सो गई. हमेशा की तरह नाक भी बजने लगी. ढाई बजे रात को नींद खुली. बाथ-रूम जाना था उसे. मैं सहारा देकर ले गया. लौटते समय बेड-रुम के दरवाजे तक पहुंची ही थी कि जोर की एक हिचकी आई और मेरी बाहों में झूल गई वह.
    मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी. जीवन के उन्तीस अविस्मर्णीय वर्ष साथ-साथ व्यतीत करने के बाद अकेला छोड़ ही दिया उसने. मेरा करुण क्रन्दन भी रोक नहीं पाया उसे.
    शव-यात्रा के पहले उसका शृंगार किया गया. नहला-धुलाकर शादी वाला जोड़ा पहनाया गया. होठों पर लिप्स्टिक लगाई गई. शृंगार पूरा होने के बाद मुझे बुलाया गया. मुझे उसकी मांग में सिन्दूर भरना था. अब मेरा साहस जवाब देने लगा. मेरे पैर कांपने लगे, लड़खड़ाया, लगा कि गिर जाऊंगा. तभी किसी ने थामा. चौहान भाभी थीं वो. आदेशात्मक स्वर में बोलीं –
    “विपिनजी! बहुत सौभाग्यशालिनी थीं आपकी गीतू. मुझसे कहती थीं – मैं सुहागिन मरना चाहती हूं. भगवान ने उनकी इच्छा पूरी की. हर हिन्दू औरत की यह प्रबल इच्छा होती है कि वह सुहागिन मरे. लेकिन कितनों को यह नसीब हो पाता है? वह पतिव्रता थीं, महान थीं. लीजिए यह सिंधोरा और भर दीजिए सिन्दूर से उनकी मांग, पूरी कर दीजिए उनकी अंतिम इच्छा. रोने के लिए तो पूरी ज़िन्दगी पड़ी है.”
    मैने आंसू पोंछ लिए. पहली बार उसकी मांग में सिन्दूर भर अपने घर ले आया था. उस दिन अंतिम बार मांग में सिन्दूर भर अपने ही घर से विदा कर रहा था – हमेशा के लिए. कैसी विडंबना है? भोले शिशु को खिलौना देना, अगले क्षण छीन लेना, फिर रुलाना. क्यों रचा यह नाटक? जो हाथ पसारकर मांगता है, उसके साथ खेलो. पर जो मांगता ही नहीं, उसके साथ खेल क्यों? मेरे पास अब बचा ही क्या था – टूटी हुई आशा, नष्ट हुआ भविष्य, बुझी हुई अग्निशिखा, दहकती दिशाएं.
    मेरी छोटी सी दुनिया से वह मुक्त हो गई. वह उस विशाल आकाश का अंग बन गई, जहां ’मैं’ की संकीर्ण सत्ता का कोई अर्थ नहीं होता. अपने जीवन की सारी सार्थकता और अपने छोटे से ’मैं’ की संकीर्णता को वह मेरे छोटे स घर में छोड़कर विशाल परिसर की ओर उड़ गई. वह फिर भी, मेरे मन के आकाश में तितली की तरह काफी हल्के मन से मंडराती रहेगी, आकाश से भरी वर्षा की बूंद की तरह मेरे छोटे से आंगन में उतर आयेगी. वह तो भूल जाएगी कि कभी उसका एक शरीर था, मैं कैसे भूल पाऊंगा? उसके साथ दुख, शोक, कामना, वासना का लेशमात्र अंश भी नहीं रहेगा. उसके साथ रहेगी केवल सौन्दर्य की एक उदार, विस्तृत अनुभूति. वह लोक अत्यन्त सुन्दर होगा क्योंकि वहां नहीं होगा उसका जर्जर शरीर और नहीं होगी उससे उत्पन्न व्यथा एवं वेदना. शून्यता के बाग में आत्मा का एक फूल धीरे-धीरे खिलता रहेगा और उससे झरता रहेगा प्रेम का एक मधु-स्रोत – सारे संसार के लिए – मनुष्य के लिए – पशु-पक्षी और मेरे लिए भी.

  3. it was with great shock i took the news of breast cancer of my mother three years ago,more shocking was she had not disclosed the presence of a lump in her breast for she was afraid of chemotherapy.after she started the treatment she asked me to write a poem saying that chemo is not as frightening as she thought hence this poem
    Woman thou art Precious

    Do not disdain it as something trivial
    Defer not its presence
    Let not the fear of chemo deter you from disclosure
    Let not the doctor’s scalpel panic you
    woman thou art precious

    Hear not to frightening accounts
    Its not as difficult as it sounds
    Its but a passing phase
    And the sun will brightly shine again
    You will blossom again like spring

    Garner all you strength and join hands with your healer
    to fight the mutant in you
    Let it not get the better of you
    thou art precious
    Prabha raykar

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