Interview with Khushdeep Sehgal

हमें बहुत ख़ुशी हो रही है ब्लॉगअड्डा में और एक हिन्दी इंटरव्यू प्रस्तुत करते हुए। आज हम जिससे आपकी मुलाकात करवा रहें हैं, उनका लेखन से बहुत गहरा और पुराना रिश्ता है| वे काफ़ी साल तक पत्रकार रह चुके हैं| करीब ५ साल से वे कई विषयों पर ब्लॉग पोस्ट्स लिखते आए हैं| हमारे साथ स्वागत करें खुशदीप सहगल का जिनके ब्लॉग देशनामा ने बेस्ट हिन्दी ब्लॉग का खिताब जीता हैं| राजनीति में काफ़ी दिलचस्पी होने के कारण, उनके ब्लॉग पर अधिकतर पोस्ट राजनीति पर ही केंद्रित होती हैं|

khushdeep (1)

प्रश्न: आप 5 साल से विविध-विविध विषयों पर ब्लॉग्स लिखते आये हैं, ब्लॉगिंग की दुनिया से आपका परिचय कैसे हुआ? हमारे पाठकों को अपने ब्लॉगिंग के सफ़र के बारे में बताइये।

उ: पत्रकारिता के पेशे से पिछले 20 साल से जुड़ा हूं। इसलिए सम-सामयिक विषयों पर लेखन मेरा शौक भी है और रोजी-रोटी का ज़रिया भी। सच कहूं तो अपने काम में ही इतना व्यस्त और मस्त रहता था कि कभी ब्लॉगिंग में आने का सोचा भी नहीं था। ये 2009 के शुरुआत की बात है, मैं जिस न्यूज़ चैनल में काम करता था, वहां मेरा एक युवा साथी हिमांशु मुझसे अक्सर ब्लॉग शुरू करने के लिए कहता था। पहले तो मैं टालता रहा। लेकिन एक दिन उसने ठान लिया कि मेरा ब्लॉग बना कर ही छोड़ेगा। हिमांशु ने ब्लॉगस्पॉट के फोरम पर ‘देशनामा’ नाम से मेरा ब्लॉग बना दिया। फरवरी में ब्लॉग बन जाने के बावजूद मैंने छह महीने तक कोई पोस्ट नहीं लिखी। 16 अगस्त 2009 को मैंने पहली पोस्ट लिखी- “कलाम से सीखो शाहरुख़”- मेरी इस पोस्ट पर पहली टिप्पणी फौजिया रियाज़ की मिली थी। उस टिप्पणी को पढ़कर बहुत अच्छा लगा। फिर तो ब्लॉगिंग में रमता ही चला गया। देखते-देखते इसने जनून की शक्ल ले ली। काम से लौटने के बाद जब तक रोज़ रात एक पोस्ट नहीं लिख लेता था, चैन नहीं आता था।

प्रश्न: हिंदी भारत की राजभाषा है, इसके बावजूद क्या आपको लगता है कि भारत में बसने वाली ब्लॉगिंग की दुनिया अंग्रेज़ी में लिखने वाले लोगो की तरफ ज़्यादा पक्षपाती है? इसमें सुधार लाने के लिए क्या किया जा सकता है?

उ: ये सच है कि आज़ादी के साढ़े छह दशक के बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं मिल सका। हिंदी सिर्फ राजभाषा है। दरअसल हमारा देश भौगोलिक दृष्टि से इतना विशाल और सांस्कृतिक रूप से विविध है कि यहां हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पीछे कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं। ऐसे में अंग्रेज़ी ही एक ऐसी भाषा है जो देश के विभिन्न हिस्सों में Bridge Language बनी हुई है। मुश्किल ये है कि हमारे देश में अंग्रेजी और हिंदी को विरोधी भाषाओं के तौर पर देखा जाता है। जबकि होना ये चाहिए कि दोनों को एक-दूसरे की पूरक भाषा बनाना चाहिए। मेरा हमेशा इस बात पर भी ज़ोर रहा है कि हिंदी में अधिक क्लिष्ट (कठिन) शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए। पत्रकारिता और ब्लॉग की हिंदी ऐसी होनी चाहिए जो आसानी से सबको समझ आ जाए। साथ ही देश में अग्रेज़ी और हिंदी समेत अन्य भाषाओं के ब्लॉगर्स को भी एक दूसरे के पास लाने की आवश्यकता है। इसके लिए मैं ब्लॉग अड्डा से भी अनुरोध करूंगा कि वो देश के अलग-अलग हिस्सों में ब्लॉगर्स-मीट का आयोजन करे।

प्रश्न: आपके ब्लॉग ‘देशनामा’ में अधिकतर पोस्ट राजनीति पर ही केंद्रित होती हैं, क्या आप हमारे ब्लॉगर्स को बताना चाहेंगे कि इस विषय पर अपने विचार साझा करने की इच्छा आप में कैसे आई?

उ: राजनीति को लेकर देश के लोगों का नज़रिया अब काफ़ी बदला है। लेकिन अभी भी देश में ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो वोट देने के बाद पांच साल के लिए अपना भविष्य नेताओं पर छोड़ देते हैं। युवा वर्ग जो देश की ताकत है, वो भी देश के सरोकार से जुड़े मुद्दों की जगह टीवी पर तीन “C”- यानि Cinema, Cricket, Crime की ख़बरों को ज़्यादा शौक से देखता है। इसी वजह से ऐसे कार्यक्रम की टीआरपी ज़्यादा आती है। जब टीआरपी ज़्यादा आती है तो न्यूज़ चैनल्स भी ऐसे प्रोग्राम अधिक दिखाते हैं। तर्क ये दिया जाता है कि दर्शक देखना ही ये सब चाहते है। ये सब बाज़ारवाद की देन है। अगर युवा वर्ग देश के असली मुद्दों से अंगेज्ड रहेगा और ऐसे कार्यक्रम देखने की मांग करेगा तो मीडिया भी उन्हें वही देने के लिए मजबूर होगा। मुझे यहां ये कहने में कोई संकोच नहीं कि सोशल मीडिया के प्रभावी होने से युवा वर्ग में भी राजनीति और असली सरोकारों को लेकर चेतना बढ़ी है। इसके लिए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे के आंदोलन को भी मैं कुछ हद तक श्रेय देना चाहूंगा। इस आंदोलन से पहले 2009 से ही मैं अपने ब्लॉग पर ऐसी पोस्ट लिखता रहा जिससे समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव आ सके। मेरे ब्लॉग पर राजनीति से जुड़ी ज़्यादा पोस्ट होने की वजह भी यही रही। मेनस्ट्रीम मीडिया में रहते हुए आपके हाथ कुछ बंधे होते हैं। लेकिन ब्लॉगिंग में ऐसी कोई बंदिश नहीं है। ब्लॉग हो या फेसबुक या फिर ट्विटर, आप जब भी कुछ लिखे तो आपके अंदर का संपादक हमेशा सचेत रहना चाहिए। जैसे संवेदनशील और अच्छा संपादक तय करता है कि उसके अख़बार, पत्रिका या चैनल में क्या जाना चाहिए और क्या नहीं जाना चाहिए। ऐसे ही ब्लॉगर्स भी ये तय करें। ऐसा कुछ ना लिखें जिससे किसी को चोट पहुंचे। आपका लेखन समाज को जोड़ने वाला होना चाहिए, तोड़ने वाला नहीं।

प्रश्न: ब्लॉगिंग के अलावा आप और कौन सी चीज़ो में दिलचस्पी रखते हैं?

उ: ऐसे हर कार्यक्रम में मेरी दिलचस्पी रहती है जिससे कुछ पॉजिटिव मिल रहा हो। लेखन और घर की ज़िम्मेदारियों से कम ही वक्त मिल पाता है। ओल्ड ऐज होम में जाकर बुज़ुर्गों को चुटकुले सुनाना बहुत अच्छा लगता है। बच्चों का साथ भी बहुत अच्छा लगता है। उनके साथ मैं बिल्कुल बच्चा हो जाता हूं। मेरा मानना है कि पूरी ज़िंदगी अपने अंदर के नटखट बच्चे को जीवित रखना चाहिए। ये आपको हमेशा ऊर्जावान रखता है। आज से दो दशक पहले फिल्मों का बहुत दीवाना था। लेकिन अब ये शौक पूरी तरह छूट गया है। गावस्कर, कपिलदेव, विश्वनाथ, बेदी, चंद्रशेखर, प्रसन्ना, वेंकटराघवन, मोहिंदर अमरनाथ के वक्त क्रिकेट में जो आनंद आता था, अब नहीं आता। अब क्रिकेट मार्केट फोर्सेज़ की भेंट चढ़ गया है।

प्रश्न: कितना ज़रूरी है एक ब्लॉगर का अपने पाठकों से संवाद करना? क्या आप अपने सारे कमेंट्स का उत्तर देते है?

उ: ब्लॉगिंग की मुझे सबसे अच्छी बात ये लगी कि इससे आपको पाठक से इन्सटेंट रिएक्शन मिलता है। साथ ही आप पाठक से सीधे संवाद भी कायम कर सकते हैं। सभी के कमेंट का मैं जवाब देने की कोशिश करता हूं। किसी किसी पोस्ट पर इतनी सार्थक टिप्पणियां आती हैं कि पोस्ट का महत्व कई गुणा हो जाता है। टिप्पणियों का नाम आता है तो अमर ब्लॉगर स्वर्गीय डॉ अमर कुमार का नाम स्वत: होठों पर आ जाता है। गागर में सागर भरने वाली उनकी टिप्पणियां गूढ़ अर्थ लिए होती थीं। बेबाकी उनकी खास पहचान थी। मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे उनका भरपूर आशीर्वाद मिला। दो साल पहले कैंसर ने उन्हें हमेशा के लिए हमसे छीन लिया।

प्रश्न: आपके लिए ब्लॉगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू कौनसा है?

उ: मैं रात को तीन-तीन बजे तक जागकर पोस्ट लिखता रहा हूं। कई बार मुझे देर रात को फोन आए कि आज आप पोस्ट लिख रहे हैं या नहीं, बताइए नहीं तो हम सो जाएं। इससे सुखद और क्या हो सकता है। बुज़ुर्ग ब्लॉगर बेटे जैसा स्नेह देने लगे, युवा बड़े भाई सा आदर करने लगे। इससे ज़्यादा और क्या चाहिए। बीच में स्वास्थ्य संबंधी कुछ दिक्कत आने के बाद अब हर दिन लिखने का क्रम टूट गया है, फिर भी हफ्ते में दो-तीन पोस्ट हो ही जाती हैं।

प्रश्न: आपके ब्लॉग पर हमने कई चुटकुले भी पढ़े, जीवन का असली आनंद ऐसी छोटी खुशियों में ही हैं? आप अपने नाम को इस मामले में पूरा सार्थक कर रहे हैं, आपका इस बारे में क्या कहना है?

उ: मैं मानता हूं कि किसी को हंसाने से ज़्यादा मुश्किल काम इस दुनिया में और कोई नहीं है। इस आपाधापी वाली दुनिया में अगर आप किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं तो ये बहुत बड़ी बात है। इस मामले में स्वर्गीय खुशवंत सिंह को अपना रोल मॉडल मानता हूं। उनके मशहूर कॉलम से प्रेरणा लेकर ही मैंने अपनी पोस्ट के अंत में स्लॉग ओवर देने का सिलसिला शुरू किया। इसके लिए मुझे मक्खन, मक्खनी, ढक्कन, गुल्ली जैसे कुछ किरदार भी गढ़ने पढ़े। इनके कारनामों से पाठकों को हंसा पाया, इसे ऊपर वाले की कृपा मानता हूं।

प्रश्न: आप पेशे से एक पत्रकार है। हमें अपने इस किरदार और प्रारंभिक जीवन के बारे में और बताएं।

उ: पत्रकारिता दो दशक से मेरी रोज़ी-रोटी का साधन है। मेरा जन्म मेरठ में हुआ। वहीं गर्वमेंट कॉलेज से इंटर किया। फिर मेरठ कॉलेज से बीएससी किया। मेडिकल का स्टूडेंट था, पुणे के आर्म्ड फोर्सेज़ मेडिकल कॉलेज के लिए लिखित परीक्षा के साथ इंटरव्यू भी क्लियर किया, लेकिन चश्मे का नंबर ज़्यादा होने की वजह से सेलेक्शन नहीं हो सका। हालांकि बाद में ऑपरेशन से चश्मा उतर गया। बिजनेस फैमिली से संबंध रखता हूं, लेकिन बिज़नेस में कभी मन नहीं रमा। इसी उधेड़बुन में था कि एक घटना ने मेरा जीवन बदल दिया। ये नब्बे के दशक के शुरुआत की बात है, मैं देश-विदेश की ख़बरों के लिए बीबीसी सुना करता था। बीबीसी में मेरे शहर मेरठ के ही जसविंदर सिंह कार्यरत थे। उनका 31 दिसंबर 1993 को गोवा में मात्र 33 साल की उम्र में एक दुर्घटना में निधन हो गया। जसविंदर के व्यक्तित्व और जीवंत रिपोर्टिंग के बारे में जितना सुनता गया, उतना ही उनका मुरीद होता गया। जसविंदर को ही प्रेरणा-स्रोत मानते हुए मेरा पत्रकारिता में प्रवेश हुआ।

प्रश्न: अपने पसंदीदा 5 ब्लॉग्स बताएं। यह भी बताइये कि इन ब्लॉग्स में ऐसा क्या है, जो आपको बेहद पसंद है?

उ: देखिए मैं जिन ब्लॉग्स को पसंद करता हूं, उनका लिंक मैंने ‘देशनामा’ पर साइड बार में दे रखा है। इसलिए 5 ब्लॉग्स को छांटना मेरे लिए बड़ा मुश्किल काम है। हां ब्लॉगिंग में मैं दो लोगों को अपना गुरु मानता हूं, इसलिए उनका उल्लेख ज़रूर करना चाहूंगा समीर लाल समीर (उड़न तश्तरी) और अनूप शुक्ल (फुरसतिया)।

ब्लॉगिंग से बने दोस्तों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। गिनाना शुरू करूंगा तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेगी।

प्रश्न: आपके ब्लॉग ‘देशनामा’ ने ब्लॉगअड्डा के win में इस साल बेस्ट हिंदी ब्लॉग का खिताब जीता। इस बारे में आपका, आपके परिवार और दोस्तों का क्या कहना है?

उ: निश्चित रूप से सुखद अनुभूति रही। 8 फरवरी को जब मुंबई में अवॉर्ड समारोह हुआ, तब मैं परिवार में एक विवाह की वजह से चाह कर भी उसमें हिस्सा नहीं ले सका। लेकिन समारोह से जुड़ी एक-एक रिपोर्ट मैंने पढ़ी। अपने पसंदीदा फिल्मकार शेखर कपूर और अंग्रेज़ी के नामी ब्लॉगर्स से साक्षात ना मिल पाने का मुझे अफ़सोस रहेगा। मुझे ये अवॉर्ड मिलना ब्लॉग जगत के लगातार स्नेह और प्रोत्साहन की वजह से ही संभव हो सका। परिवार और दोस्तों की दुआओं ने भी असर दिखाया। प्रतिष्ठित जूरी के सदस्यों ने मेरे ब्लॉग को हिंदी ब्लॉगिंग में अव्वल माना, इसके लिए उनका बहुत-बहुत शुक्रिया। बाक़ी जिन्होंने मेरे लिए वोटिंग की, उनके लिए कहना चाहूंगा-
“एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों”…

प्रश्न: यदि आप कोई पोस्ट लिखते वक़्त उलझ जाते है? ऐसे में आप क्या करते है?

उ: ऐसा अमूमन होता नहीं है। जब किसी विषय का खाका दिमाग में पूरी तरह फिट हो जाता है, तब ही पोस्ट टाइप करने बैठता हूं। हां कभी रेफरेंस के लिए किताबों और गूगल का सहारा लेता हूं।

प्रश्न: आप के अनुसार, हिंदी ब्लॉगिंग का क्या भविष्य है?

उ: देखिए, हिंदी ब्लॉगिंग अब भारत में करीब एक दशक पुरानी हो चुकी है। मैंने ब्लॉगिंग की शुरुआत 16 अगस्त 2009 को की थी, उस वक्त हिंदी ब्लॉगिंग अपने पूरे उफान पर थी। ब्लॉगवाणी और चिट्टाजगत जैसे लोकप्रिय एग्रीगेटर की वजह से ब्लॉगर्स में अपना रैंक बढ़ाने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी। ये दोनों ही एग्रीगेटर बंद हो गए, इस वजह से ब्लॉगर्स का उत्साह कम हुआ। फेसबुक, ट्विटर के आने से भी ब्लॉगर्स का रुख उस तरफ हुआ। लेकिन मेरा अब भी यही मानना है कि सही दिशा में प्रयास किया जाए तो हिंदी को देश-विदेश में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए ब्लॉगिंग से अच्छा माध्यम और कोई नहीं है। हिंदी पट्टी के युवाओं को इस विधा से अधिक से अधिक जोड़ा जाए तो भी अच्छे परिणाम आ सकते हैं। स्कूल-कॉलेज में प्रोजेक्ट के तौर पर ब्लॉगिंग को पाठ्यक्रम से जोड़ने के भी प्रयास किए जाने चाहिए। एक बात गूगल और, गूगल का विज्ञापन से आय देने वाला एडसेंस प्रोग्राम हिंदी के ब्लॉग्स को एप्रूव नहीं करता। अंग्रेज़ी ब्लॉग्स को एडसेंस से होने वाली आय की तरह हिंदी ब्लॉग्स को भी इंसेटिव मिले तो अधिक से अधिक युवा ब्लॉगिंग के लिए प्रेरित होंगे।

प्रश्न: चलिए, अब हमें अपनी कुछ प्रिय चीज़ों से परिचित कराएं-

रंग: आसमानी
मूवी: सत्यकाम
टेलिविजन शो: प्रधानमंत्री (शेखर कपूर की एंकरिंग में एबीपी न्यूज़ का शो)
किताब: मेरे सपनों का भारत (लेखक- महात्मा गांधी)
खाद्य-पदार्थ: जो भी मिल जाए बस शाकाहारी

 खुशदीप सेहगल के साथ कनेक्ट करें: ब्लॉगअड्डाट्विटरब्लॉग.

बहुत बहुत धन्यवाद खुश्दीप जी इस इंटरव्यू के लिए। प्रिय पाठक, हमें उम्मीद है की आपको हमारा यह प्रयास पसंद आया। आपके विचार हमें कमेंट्स द्वारा ज़रूर बताएं। :)

जो व्यक्ति हमारे WIN ’14 समारंभ का हिस्सा ना हो सके, वे सब उस दिन की तस्वीरें यहा देख सकते हैं|

 

6 Replies to “Interview with Khushdeep Sehgal”

  1. Aapne blogging ke baare me itna kuch btaya or saath hi apne personal experience ko hamare saath share kiya iske liye bahut bahut dhanywad.

  2. Mai apse bhut jyada parbhavit hua hu. Apka interview ka koi jwab hi nahi hai Sir ji. Bhut bhut badiya interview series apne blogger ke liye di hai. Thanks a lot to share this Interview Series.

  3. India ke aane wale bloggers ke liye apne is website ke jariye jo kam kiya hai sayad hi vah koi aur krega | Main apka bhut adhik aabhari hu ki apne hmare liye ak asa platform banaya hai jo hame nayi nayi cijo ke bare me jankari deta hai | Sath hi sath hum ase logo ki opinions ko smjte aur sunte hai jo aj ke time ak misal ke rup me hame motivate krte hai | Main apka dil se Danyawad karna chahta hu Sir ji |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *