Interview with Ravishankar Shrivastava

अद्भुत! एक व्यक्ति में इतने सारे गुण है, और वे सक्षम रूप से हर कार्य को सफलतापूर्वक करते है। बढ़िया व्यंग करके हमें हसाते है। कई हिंदी चिट्ठाकारों को हिंदी में लिखने की तकनिकी सहायता देते है, और ट्विटर  ट्रांसलेटर भी है। क्या आपको पता था की कंप्यूटर में हिंदी लिखने के लिए २०० से अधिक कीबोर्ड लेआउट हैं?! यह जानकारी हमें इनसे ही मिली है। मिलिए रविशंकर श्रीवास्तव, या रविरतलामी जी से, इस शानदार साक्षात्कार में। चलिए उनके बारे में कुछ जानते है उन्ही की जुबानी। 🙂

प्रश्न: आपने ब्लॉगिंग की शुरुआत कब और क्यूँ की?

मुझे सदैव से पढ़ने लिखने में रुचि रही है। हास्य-व्यंग्य और ग़ज़ल-नुमा तुकबंदियाँ मैं लिखा करता था, जो छिट-पुट पत्र पत्रिकाओं में यदा कदा प्रकाशित होती रहती थीं। इस बीच इंटरनेट जैसी चीज जब आई तो लगा कि यह तो सृजनशील लोगों के लिए वरदान की तरह है। तब ब्लॉग जैसे कॉन्सेप्ट की शुरूआत नहीं हुई थी और इंटरनेट पर हिंदी प्रदर्शन हेतु यूनिकोड फ़ॉन्ट का अवतरण नहीं हुआ था। ऐसे में जियोसिटीज.कॉम (भगवान इसकी आत्मा को शांति प्रदान करें,) का प्रयोग लोग बाग़ अपनी सृजनशीलता का प्रदर्शन करने के लिए धड़ल्ले से किया करते थे। जियोसिटीज पर मेरा भी एक खाता था, जिसमें मैंने अपनी तमाम प्रकाशित अप्रकाशित रचनाओं को पहले तो पीडीएफ फ़ाइल के रूप में अपलोड किया और जब यूनिकोड हिंदी में इंटरनेटी पृष्ठों को दिखाने की सुविधा हासिल हुई, तो उन्हें यूनिकोड में भी अपलोड किया। और जब बाद में ब्लॉग की विशेषताओं, खासकर इंटरनेट पर यूनिकोड हिंदी में मल्टीमीडिया युक्त प्रकाशन की आसान सुविधा और आरएसएस फ़ीड की सुविधा के चलते इसकी अनंत संभावनाओं को समझा, तो इसे अपनाने में मैंने तनिक भी देरी नहीं की, और जून २००४ से मेरी ब्लॉगिरी निरंतर जारी है।

प्रश्न: आप अक्सर किन विषयों पर ब्लॉग करते हैं?

वैसे तो मेरा पसंदीदा विषय हास्य-व्यंग्य ही रहा है, मगर आजीविका की तकनीकी पृष्ठभूमि के कारण, तकनीकी विषयों पर भी मैं लिखता हूँ। जब हिंदी ब्लॉगिंग की शुरूआत हुई तो उसी समय इंटरनेट व कंप्यूटरों में भी हिंदी प्रदर्शन और पढ़ने लिखने की तकनीकी भी विकसित हो रही थी। तब प्रायः लोगों को अपने कंप्यूटरों में हिंदी सक्षम करने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ लगाने पड़ते थे। मैंने इन जुगाड़ों को व अपने स्वयं द्वारा भुगते परेशानियों के हल व हिंदी कम्प्यूटिंग के लिए उपलब्ध सुविधाओं को ट्यूटोरियल के रूप में, अपने ब्लॉग में प्रकाशित करना प्रारंभ किया, ताकि जानकारी एक ही स्थल पर उपलब्ध हो सके। हिंदी कंप्यूटिंग आज भले ही परिपक्व हो चुकी है, मगर आउट ऑफ द बॉक्स सॉल्यूशन अभी भी उपलब्ध नहीं रहता। ऐसे में सहायता के लिए तकनीकी आलेखों का लेखन अभी भी जारी है।

प्रश्न: क्या आप कोई पोस्ट लिखते वक़्त उलझ जाते है? ऐसे में आप क्या करते हैं?

पोस्ट लिखने के लिए मन में सैकड़ों विचार चलते रहते हैं और दर्जनों विषय सामने रहते हैं। समस्या समय की रहती है, जिसका सदैव अकाल रहता है। कई मर्तबा अच्छे विषय छूट जाते हैं, या फिर समय बीतने के साथ असामयिक हो जाते हैं। आमतौर पर एक बार लिखना प्रारंभ करने के बाद उलझन जैसी चीज पैदा नहीं होती, क्योंकि मस्तिष्क में पूरे आलेख का खाका पहले ही तैयार हो चुका होता है। बस, उलझन शुरूआत करने में ही होती है – क्योंकि दीगर प्राथमिकताएं सामने मुंहबाए खड़ी जो रहती हैं।

प्रश्न: रतलाम में बिताए गए वर्षों के बारे में हमें कुछ बताएं। विद्युत यांत्रिकी में स्नातक की डिग्री क्या आपने यहीं से हासिल की? वर्तमान में आपके व्यवसाय और उद्योग के बारे में कुछ बताएं। भोपाल, जहाँ आप अभी रहते हैं, और रतलाम के रहन-सहन में क्या अंतर आपको महसूस हुआ?

रतलाम में मैं १९८९ से २००८ तक रहा। एक कहावत है – दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। तो मैं कहता हूं – शहर शहर पर लिखा है रहने वाले का नाम। विद्युत मंडल की नौकरी में रतलाम स्थानांतरण से पहले मैं राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ में पदस्थ था। रतलाम में १९ वर्ष रहा और इस शहर ने मेरे नाम में रतलामी टैग जोड़ दिया। यह छोटा सा शहर अपने बेहद स्वादिष्ट रतलामी नमकीन के कारण प्रसिद्ध है। मैंने विद्युत यांत्रिकी में स्नातक की उपाधि इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, कोलकाता से हासिल की थी। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल में मैंने कोई २० वर्षों तक कार्य किया (जिसे अभी हाल ही में भंग कर, उसका दाह संस्कार कर दिया गया और ४ प्राइवेट कंपनियों के रूप में बदल दिया गया) और जुलाई २००३ में मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। वर्तमान में मैं कंप्यूटर/अनुप्रयोग स्थानीयकरण (अनुवाद व लोकलाइजेशन) व कंटेंट डेवलपमेंट तथा टेक्निकल कंसल्टेंसी का कार्य करता हूं, तथा विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में न्यू मीडिया टेक्नॉलाजी की कक्षाएं लेता हूं।

रहा सवाल भोपाल और रतलाम के रहन सहन में भिन्नता का, तो चूंकि भौगोलिक दृष्टि से दोनों ही शहर एक ही प्रांत के हैं, अतः कोई विशेष अंतर नहीं है। रतलाम छोटा सा, शांत शहर है। दो-बत्ती और माणक चौक नामक क्षेत्र के आसपास सिमटा हुआ। जब आप वहाँ से गुजरते हैं तो आमतौर पर हर चौथा व्यक्ति आपको पहचानता है। भोपाल अपेक्षाकृत बहुत बड़ा है और आपकी आइडेंटिटी यहाँ गुम हो जाती है। परंतु भोपाल में साहित्य, संस्कृति और कला की गतिविधियाँ वर्ष भर चलती रहती हैं, जिनका आनंद यदि रूचि हो तो आप ले सकते हैं। भोपाल के जिस क्षेत्र में मैं अभी रहता हूँ, वो अपेक्षाकृत सुंदर और खुला-खुला सा है और हरियाली से भरपूर, जिसका अभाव रतलाम में था। रतलाम में रतलामी नमकीन के साथ साथ सड़कों में गड्ढे और धूल मुफ़्त में मिलते हैं। भोपाल राजधानी और वीआईपी रहवासियों का इलाका होने के कारण इन समस्याओं से थोड़ा दूर है। और फिर यहाँ भोपाल का ताल भी तो है।

प्रश्न: जब आपने ब्लॉगिंग की शुरुआत की, तब हिन्दी फ़ॉन्ट में लिखने की बड़ी समस्या सामने आई। अब आप आसानी से हिन्दी में कैसे लिख पाते हैं, अपने कुछ सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग बताएं। क्या इस विषय में और सुविधाओं के सामने आने की आवश्यकता है? आपके ब्लॉग का कोई पोस्ट, या वेब का कोई ऐसा साधन हमें बताइए, जो नए हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए लाभदायक साबित हो।

कंप्यूटर पर हिंदी में लेखन मैं पिछले २२-२३ वर्षों से कर रहा हूं – डॉस – अक्षर के जमाने से। और कंप्यूटरों में हिंदी फ़ॉन्ट में समस्या की जड़ सरकारी नीति/नियम का अभाव और भिन्न कंपनियों द्वारा लाभ उठाने का तुच्छ दृष्टिकोण ही रहा है।

एक उदाहरण आपके सामने प्रस्तुत है। आज भी विभिन्न देश प्रदेश में हिंदी में टाइपिंग की परीक्षा आयोजित होती है और कई सरकारी/गैर सरकारी/बैंक आदि की लिपिकीय नौकरियों के लिए हिंदी टाइपिंग पास करना जरूरी होता है। हिंदी टाइपिंग का प्रचलित कीबोर्ड लेआउट रेमिंगटन है। मगर भाई, लोगों ने हिंदी टाइपिंग के लिए इस प्रचलित लेआउट को कंप्यूटर टाइपिंग के लिए बरकरार रखने के बजाए, तमाम तरह के प्रयोग कर डाले। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, कि कंप्यूटर में हिंदी लिखने के लिए २०० से अधिक कीबोर्ड लेआउट हैं! कोढ़ में खाज यह, कि भारत की सरकारी संस्था सीडैक ने जब हिंदी कंप्यूटिंग समाधान प्रदान करना प्रारंभ किया, तो पता नहीं किस वैज्ञानिक (या अवैज्ञानिक?) दृष्टिकोण से इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड लेआउट को स्टैंडर्ड मान लिया। मुझे भी बड़ी समस्या आई। मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में हिंदी टाइपिंग सीखा था। पहले पहल कंप्यूटर शब्द संसाधक डॉस अक्षर में यही रेमिंगटन कीबोर्ड लेआउट था, जिससे कोई परेशानी नहीं हुई। मगर बाद में यूनिकोड टाइप करने के लिए रेमिंगटन भूल कर इनस्क्रिप्ट अपनाना पड़ा, क्योंकि उस वक्त यूनिकोड हिंदी को टाइप करने के लिए रेमिंगटन कीबोर्ड लेआउट ही नहीं था! बाद में लोगों की इस किस्म की समस्याओं का समाधान करने के लिए तमाम तरह के कीबोर्ड लेआउट आए, जिसमें रेमिंगटन, फ़ोनेटिक इत्यादि सभी हैं।

चूंकि अब इनस्क्रिप्ट हिंदी के डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड लेआउट के रूप में तमाम ऑपरेटिंग सिस्टमों में प्री-इंस्टाल्ड आने लगा है, अतः हिंदी में लिखने वालों को मैं सुझाव दूंगा कि वे इसे ही अपनाएं। यह टच-टाइपिंग के लिए भी उपयुक्त है। मैं भी इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड ही प्रयोग कर रहा हूं। हिंदी में अभी तक एक अच्छे मुफ़्त वर्तनी जांच की सुविधा का अभाव है। एक ऐसा वर्तनी जाँचक जो नोटपैड से लेकर ब्राउज़र इनपुट विंडो, और आपके ईमेल क्लाएंट तक में लिखे हिंदी सामग्री की वर्तनी लिखते लिखते ही जांचे और आपको सही वर्तनी युक्त शब्द का विकल्प दे। उम्मीद करें कि हिंदी प्रयोक्ताओं को यह जल्द ही हासिल हो।

हिंदी के नए ब्लॉगरों की हिंदी संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए मैंने अपने ब्लॉग में कुछ संसाधन जुटाए हैं, जिन्हें वे यहाँ देख सकते हैं। इस हेतु एक बेहद सक्रिय हिंदी चिट्ठाकार समूह भी है, जिसमें जुड़कर वे अपनी समस्याओं को रख सकते हैं, या वहाँ के आर्काइव पर सर्च कर समस्याओं का समाधान देख सकते हैं। वहाँ हिंदी कंप्यूटिंग संबंधी हर किस्म की समस्याओं का गारंटीड समाधान उपलब्ध है।

प्रश्न: आपने अपने ब्लॉग पर कई बार अख़बारों के समाचार पर टिप्पणी एवं व्यंग्य भरे पोस्ट लिखे हैं। क्या भारत के समाचार प्रस्तुत करने की क्षमता, सिर्फ व्यंग्य के काम आने तक ही सीमित हो गई है, या अब भी कुछ सुधार की उम्मीद है?

मूलतः मैं एक व्यंग्यकार ही हूं। तो मेरे ब्लॉग में भी मेरा यही रूप परिलक्षित होता है। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि भारत के संचार माध्यमों की समाचार प्रस्तुत करने की क्षमता सिर्फ व्यंग्य के काम आने तक ही सीमित हो गई है, पर यह बात भी सही है कि दरअसल अब समाचार ही ऐसे आने लगे हैं जो स्वयं ही हालिया सामाजिक परिवेश पर बड़े व्यंग्य हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में केंद्र सरकार ने गरीबी का जो मापदण्ड जारी किया वही अपने आप में एक बड़ा व्यंग्य था। मैं अपने व्यंग्यात्मक टिप्पणियों में इन्हीं बातों को हाईलाइट करता हूं।

और, जब आप कहीं तंज कसते हैं, व्यंग्य मारते हैं तो आपको यह खतरा भी उठाना पड़ता है कि आपके व्यंग्य को उस रूप में ग्रहण किया जा रहा है या नहीं। व्यंग्यकार के साथ अकसर यह बड़ा खतरा मौजूद रहता है कि उसकी बात को प्रत्यक्ष तौर पर ले लिया जाता है, उसके अर्थ को नहीं, और यहीं अर्थ का अनर्थ हो जाता है। मेरे भी कई व्यंग्यों को लोगों ने समझा ही नहीं, या दूसरे तरीके से समझा। अब इस मामले में मैं लोगों के दृष्टिकोण को तो नहीं बदल सकता, उनमें कहीं से लाकर सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो नहीं भर सकता!

प्रश्न: हाल ही में हिन्दी ब्लॉगिंग जगत और उसके सफलता एवं वर्तमान स्थिति के बारे में लिखे गए एक लेख को आपने अपने ब्लॉग पर पुन: पेश किया था। आपके विचार में क्या हिन्दी ब्लोगिंग का भविष्य उज्जवल है? अगर हाँ, तो आपके ख्याल में, इस उज्जवल भविष्य के साकार होने के लिए, हिन्दी चिट्ठाकारों को क्या उचित कदम उठाने चाहिए?

हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य बेहद उज्जवल है। हिंदी ब्लॉगिंग पर मेरा एक बहु प्रचलित और प्रसिद्ध कथन है – हिंदी के नए सूर और तुलसी हिंदी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे।

वर्तमान में हिंदी ब्लॉगिंग में मैं एक चीज का अभाव देखता हूं। वह है प्रोफ़ेशनलिज़्म। यदि हिंदी ब्लॉगिंग में स्थापित होना है तो आपको बेहद प्रोफ़ेशनल होना होगा। अतिशय नियमितता दिखानी होगी। गुणवत्ता पूर्ण, परिपूर्ण आलेख लिखने होंगे। हालांकि हाल के दिनों में स्थिति में सुधार दिखने लगा है और प्रतिबद्ध हिंदी ब्लॉगरों की फौज अब तैयार होने लगी है।

प्रश्न: हाल ही में हिन्दी डोमेन नेम में यह उन्नति प्रत्याशित है, कि अब हम हिन्दी में भी यु।आर।एल। टाइप कर पाएँगे। इस सुविधा के क्या फायदे हो सकते हैं, और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा?

हिंदी डोमेन नेम की यह सुविधा निःसंदेह एक बड़ी, बहुप्रतीक्षित सुविधा है। अब हमारी रोमन अक्षरों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त होने को है। अपना कंप्यूटिंग और ब्राउजिंग वातावरण और अनुभव अब पूर्णतः देवनागरी हिंदी हो जाएगा। इससे नए डोमेन नेम पंजीकरण हेतु मिलेंगे और वातावरण पूर्णतः हिंदीमय बनाने में मदद मिलेगी। कुछ तकनीकी चुनौतियाँ भी होंगी – ब्राउजरों के पता पट्टी में हिंदी टाइपिंग आवश्यक होगा जो कई मामलों में परेशानी पैदा कर सकता है। यदि प्रयोक्ताओं के कंप्यूटरों या मोबाइल उपकरणों में हिंदी टाइपिंग की अंतर्निर्मित सुविधा यदि मौजूद नहीं हो तो मुश्किल खड़ी होगी। मगर आने वाले दिनों में इस तरह की समस्या से यकीनन छुटकारा पा लिया जाएगा। तकनीक दिनों दिन उन्नत जो होती जा रही है।

प्रश्न: सुनील हांडा जी की किताब आपको इतनी पसंद आई की आपने तो उस किताब की हर कहानी का हिन्दी अनुवाद करने की शुरुआत कर दी! कौनसी कहानी अब तक सबसे ज्यादा प्रिय रही है, और वह किस प्रकार आपको प्रेरित करती है?

सुनील हांडा की इस किताब में ५०० से अधिक छोटी-छोटी प्रेरक कहानियाँ हैं। आप देखेंगे कि इंटरनेट में अंग्रेज़ी सामग्री का प्रचुर भंडार है। हर विषय में सामग्री है। जबकि हिंदी में इस तरह की सामग्री का सर्वत्र अकाल है। सुनील हांडा ने यह किताब कॉपी लैफ़्ट रखा था। तो मुझे लगा कि इन अमूल्य कहानियों को हिंदी में भी आना चाहिए। और इसे लोगों तक पहुँचाने में ब्लॉग से उत्तम और क्या हो सकता था। बहरहाल, यह कार्य अब पूरा हो चुका है, जिसमें उत्साही मित्र परितोष मालवीय का भी बराबर का सहयोग रहा। और खुशी की बात है कि प्रभात प्रकाशन द्वारा इस अनुवादित सामग्री का उपयोग कर प्रिंट संस्करण लाया जा रहा है।

किताब की तमाम कहानियाँ अच्छी हैं और सभी प्रेरक हैं। बहुत सी कहानियों में सूफ़ियाना, गहन संदेश भी छुपे हुए हैं। किशोरों और युवाओं को इन कहानियों का पाठ अवश्य ही करना चाहिए।

प्रश्न: इंटरनेट पर आप काफी समय बिताते हैं, कई हिन्दी लेखन की वेबसाइट खोजते रहते हैं, और अपने ब्लॉग में भी इंटरनेट के बारे में लिखते हैं। चूंकि आप प्रौद्योगिकी उद्योग में है, और अच्छी जानकारी रखते हैं, आपके विचारधारा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी भारत में किस और बढ़ रहा है, और इसका भविष्य क्या है? मौजूदा समय से, कौन से प्रचलित आविष्कार सबसे महत्वपूर्ण और सार्थक साबित हुए है?

बड़े दुःख की बात है कि भारत में विज्ञान और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में शोध और विकास के लिए मूलभूत तंत्र (बेसिक इनफ्रास्ट्रक्चर) ही नहीं है। लालफीताशाही और भ्रष्टाचार तथा फर्जी समाजवाद/साम्यवाद के चलते भारत का टैलेंट ब्रेन-ड्रेन का शिकार तो दशकों से रहा है। मुझे नहीं लगता कि इस क्षेत्र में भारत में कोई तीर मारने वाला जैसा काम आने वाले दशकों में हो पाएगा। यहाँ तक कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विकास की अवधारणा भी अफसरों और नेताओं के मिलीभगत में उन्हीं नई-नई स्कीमों के प्रादुर्भाव के जरिए होता है जिनमें उनकी अच्छी अंडर-कटिंग की संभावनाएं होती हैं। निजी क्षेत्रों में भी कोई विशेष रुझान नहीं दिखता – वे भी अपने बैलेंस शीट में मुनाफा बढ़ाते रहने की एक मात्र जुगत में ही दिखते हैं।

मौजूदा समय में ग्रीन/रिन्यूएबल इनर्जी संबंधी आविष्कारों, नवीन प्रयोगों पर अधिक से अधिक काम किया जाना चाहिए क्योंकि फ़ॉसिल फ़्यूल खत्म हो चले हैं और फलस्वरूप नित्य प्रति महंगे होते जा रहे हैं। सदी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आविष्कार स्मार्ट-मोबाइल फ़ोन है। एक अदद शक्तिशाली कंप्यूटर आपकी जेब में। आपके हर किस्म के काम को कर सकने की क्षमता युक्त!

प्रश्न: हिंदी साहित्य में आपकी अधिक रूचि दिखाई देती है। आप हिंदी का साहित्यिक ब्लॉग भी चलाते हैं, इसके बारे में हमें और बताएं। आप ट्विट्टर के अधिकृत हिन्दी ट्रांसलेटर भी हैं। आपकी इस भूमिका पर भी कुछ प्रकाश डालें।

जैसे कि मैंने प्रारंभ में ही कहा, कंप्यूटरों व इंटरनेट से मूलतः मैं अपनी रचनाओं को लिखने व प्रकाशित करने के लिए ही जुड़ा था। साहित्य के कीड़े ने मुझे बचपने में ही काट लिया था। लिखने और पढ़ने का शौक रहा है। जब मैंने अपनी स्वयं की रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए ब्लॉग बना लिया तो कुछ समय बाद मित्रों का आग्रह आया कि उनकी रचनाएँ भी  किसी तरह इंटरनेट पर आएं। उनके पास ब्लॉग बनाने और लिखने की सुविधा नहीं थी। तब मैंने रचनाकार नामक ब्लॉग बनाया और उसमें बिना किसी पूर्वग्रह के हर किस्म की रचनाएं हर रचनाकार की छापनी शुरू कर दी। लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। आज यह ब्लॉग हिंदी साहित्य का सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वाधिक कंटेंट, सर्वाधिक सदस्यता, सर्वाधिक पेजहिट्स वाला यूनिकोडित हिंदी का पहला ब्लॉग है।

इस ब्लॉग को हिंदी के कुछ श्रेष्ठ रचनाकार प्रदान करने का श्रेय भी जाता है। भास्कर।कॉम के वर्तमान संपादक और व्यंग्यकार अनुज खरे के शुरुआती व्यंग्यों को रचनाकार में पहले पहल प्रकाशित कर जगह प्रदान की गई और आज वे स्थापित व्यंग्यकार हैं। उनके 2 व्यंग्य संग्रह निकल चुके हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं।

ट्विटर का हिंदी अनुवाद बहुत से स्वयंसेवी अनुवादकों द्वारा किया जाता है। मैं भी उनमें से एक हूं। मैंने बस पिछले हिंदी दिवस – सितम्बर २०११ पर अनुवादों को पूरा करने व ट्विटर हिंदी में जारी करने में अतिरिक्त सक्रिय सहयोग दिया था। ट्विटर में अभी भी बहुत से अनुवाद ठीक नहीं हैं और कच्चे-पक्के हैं उन्हें ठीक करना आवश्यक है। इसके लिए ट्विटर के स्थानीयकरण प्रमुख को कुछ पहल करनी होगी। मैंने उन्हें लिखा भी था, परंतु लगता है कि यह उनकी प्राथमिकता में नहीं है।

प्रश्न: आप FOSS.IN के सक्रीय सरगर्म रहे है। क्लोज़ Vs ओपन सोर्स सॉफ्टवेर बहस हमेशा ही सबका पसंदीदा रहा है, और इस विषय पर सबके अलग दृष्टिकोण जानना भी रोचक लगता है। हम आपका दृष्टिकोण भी जानना चाहेंगे।

मेरा बहुत सारा कार्य लिनक्स को हिंदी व छत्तीसगढ़ी भाषा में लाने का रहा है। लिनक्स व उस में उपलब्ध तमाम अनुप्रयोग फ्री ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर (FOSS) के तहत जारी किए जाते हैं। मेरा मानना है कि दुनिया में दोनों तरह की सामग्री होनी चाहिए। लिनक्स की तरह मुफ़्त व मुक्त भी तथा मालिकाना विंडोज की तरह भी। दुनिया को दोनों तरह की चीजों का लाभ मिलना चाहिए। इससे दोनों ही प्लेटफ़ॉर्म में बेहतर करने का दबाव बना रहता है। और, इसीलिए आप देखेंगे कि आज जहाँ कंप्यूटरों व डेस्कटॉप में विंडोज का बोलबाला है, तो मोबाइलों में एण्ड्रॉयड का।

प्रश्न: छत्तीसगढ़ी अनुप्रयोग सूट के।डी।ई। के लिए मंथन पुरस्कार मिलना आपके लिए गौरव का क्षण होगा। इस परियोजना के ऊपर काम करने का आपका अनुभव कैसा था? आप वर्तमान में किस योजना पर काम कर रहे है?

मेरी जन्मभूमि छत्तीसगढ़ है। वहाँ की बोली छत्तीसगढ़ी है। लिपि देवनागरी ही है, और यह हिंदी की उप-भाषा है। छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने से इस भाषा को संरक्षित करने में जनता व सरकार का रुझान बढ़ा है। हममें से हरएक को अपने समुदाय को कुछ वापस लौटाना चाहिए। इसी सोच से अभिप्रेरित होकर मैंने कंप्यूटर अनुप्रयोग सूट के।डी।ई। का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया।

डिजिटल डिवाइड की बात सर्वत्र होती है। आज भी भारत की अधिकांश जनसंख्या गांवों में रहती है और अंग्रेज़ी नहीं जानती। यदि उन्हें कंप्यूटर शिक्षित बनाना है तो कंप्यूटरों को उनकी भाषा में लाना होगा। ओपनसोर्स सॉफ़्टवेयरों के द्वारा यह काम आसानी से किया जा सकता है। हालांकि छत्तीसगढ़ी अनुप्रयोग सूट के वास्तविक उपयोग करने वाले नगण्य ही रहे, मगर नींव तो डाली जा चुकी है। वर्तमान में मुफ़्त व मुक्त ओपनसोर्स हिंदी वर्तनी जांच पर कार्य जारी है, और बहुत संभव है कि आने वाले हिंदी दिवस सितम्बर २०१२ में यह जनता के आम उपयोग के लिए लोकार्पित हो जाए।

प्रश्न: वर्ग पहेली पर आपके प्रयास की दाद देनी पड़ेगी! आपका अनुशासन इस ब्लॉग में झलकता है। इन पहेलियों को बनाने के लिए आप किन चीज़ों का ध्यान रखते है और हिन्दी पहेलियाँ बनाना कितना मुश्किल / सरल है?

प्रशंसा के लिए धन्यवाद। हिंदी में पहेलियां बनाना बेहद कठिन, उबाऊ और श्रमसाध्य काम है। आपने यदि ध्यान दिया होगा तो पाया होगा कि अभी भी इन पहेलियों में संयुक्ताक्षर शामिल नहीं हैं। संयुक्ताक्षर वहाँ वर्ग में टूट कर अलग दिखते हैं। यदि आप प्रकाश लिखना चाहें तो वहाँ यह प् र का श जैसा छपेगा। साथ ही क्रासवर्ड फोर्ज नामक जो सॉफ़्टवेयर मैं प्रयोग करता हूँ, उसमें मनमाफिक क्रासवर्ड बनाने की सुविधा नहीं है। आप जो शब्द इसकी मेमोरी में भर देते हैं, उन्हीं में से शफल कर स्वचालित क्रासवर्ड बना देता है, जो कई बार ठीक नहीं लगता। वैसे तो क्रासवर्ड बनाने के दर्जनों प्रोग्राम हैं, मगर उनमें किसी में भी हिंदी यूनिकोड का समर्थन नहीं है।

इसीलिए हिंदी पहेलियाँ बनाना अभी भी दुरूह है। मैं बहुत समय से इन पहेलियों की संख्या १००० तक ले जाना चाह रहा हूं, मगर गाड़ी १००-१२५ पर ही अटकी हुई है।

प्रश्न: आपके परिवार में कौन कौन है? आप अपने परिवार जनों के साथ किस प्रकार समय बिताते है? आपके और क्या शौक है?

मेरा परिवार ‘न्यूक्लियर फ़ैमिली’ है। हम दो हमारे दो। पत्नी रेखा चित्रकला की प्राध्यापक है, पुत्र अन्वेष व पुत्री अनु इंजीनियरिंग के साथ साथ फ़ेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर, गूगल-बुक्स, टोरेंट और कंप्यूटर गेम्स इत्यादि-इत्यादि की पढ़ाई कर रहे हैं। यानी जब हम डाइनिंग टेबल पर साथ नहीं होते हैं या फिर कहीं साथ आउटिंग पर नहीं होते हैं तो सभी अपने-अपने लैपटॉप या टर्मिनल पर व्यस्त होते हैं।

पढ़ने लिखने के अलावा मेरा शौक है गीत-संगीत सुनना। दिनभर संगीत बजता रहता है – हर किस्म का। अलबत्ता रेडियो मिर्ची पर चलते बकबक से घोर चिढ़ है।

प्रश्न: क्या आप अपने ब्लॉग को प्रमोट करते है? आप कौनसे प्रमोशनल माध्यमों का उपयोग करते है?

आह! काश मैं ऐसा कर पाता। काश मैं भी निर्धन बाबा की तरह टीवी चैनलों पर अपने ब्लॉग को प्रमोट कर पाता। वहाँ अपने ब्लॉग समागम को दिखा पाता जिसमें पैसे देकर आए हुए लोग बताते कि मेरे ब्लॉग को पढ़कर उन्हें कितना फायदा हुआ, कितने ज्ञान में वृद्धि हुई और उन्हें प्रभु की कितना किरपा मिलने लगी। परंतु मेरे पास ऐसी शुरूआत करने के लिए फंड नहीं है। जिस दिन फंड हासिल हो जाएगा, मैं अपने ब्लॉग को प्रमोट करने का कुछ इसी तरह का काम कर दूंगा और बाकी तो, जैसा कि आप जानते हैं, फिर इतिहास होगा।

प्रश्न: कितना ज़रूरी है एक ब्लॉगर का अपने पाठकों से संवाद करना? क्या आप अपने सारे कमेंट्स का उत्तर देते है?

पाठकों से संवाद जरूरी है, और इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा। ब्लॉग की प्रकृति ही है – दो तरफ़ा, त्वरित संवाद। परंतु चूंकि मेरे पास समयाभाव सदैव होता है, इसीलिए मैं तमाम टिप्पणियों का प्रत्युत्तर नहीं दे पाता। टिप्पणियों में मैंने मॉडरेशन लगाया है (हर संजीदा ब्लॉगर को यह करना चाहिए) और मैं उन्हें ही समय पर एप्रूव नहीं कर पाता हूं। वैसे कुछ जरूरी तकनीकी प्रश्नों व चाही गई मदद का उत्तर मैं देर-सवेर  देने की कोशिश जरूर करता हूं।

प्रश्न: आपके लिए ब्लोगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू कौन सा है?

ब्लॉगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू तो यही है कि यह आपकी सृजनशीलता को एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करता है जहाँ आप पूरे विश्व में अपनी पहचान बना सकते हैं। यह आपको रिकॉग्नीशन प्रदान करता है। बस्तर से न्यूयॉर्क तक अपना पाठक वर्ग, प्रशंसक तैयार कर सकते हैं। ब्लॉगिंग से पहले रविरतलामी का कोई वजूद नहीं था। यहाँ तक कि रतलाम में इसके अपने ऑफिस और छोटे से मित्र मंडली के अलावा कोई इस शख्स को जानता तक नहीं था। ब्लॉगिंग ने इसे विश्व स्तर पर एक पहचान दिलाई। एक हद तक प्रसिद्धि भी। जब सनडे टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लीड स्टोरी में आपकी ब्लॉगिंग को कवर किया जाए, या ब्लॉग-अड्डा में साक्षात्कार के लिए आपको आपकी ब्लॉगिंग के कारण बुलाया जाए, तो यह निसंदेह आपको संतुष्टि तो देगी ही।

साथ ही, रचनाकार या वर्ग-पहेली जैसे कुछ नायाब ब्लॉग प्रकल्पों के जरिए यदि आप समाज को कुछ देते हैं, कुछ लौटाते हैं, तो यह भी बड़ी संतुष्टिदायक बात होगी ही।

प्रश्न: भारतीय ब्लॉगों का एक विश्व स्थर पर क्या मूल्य है? अपने पसंदीदा ५ ब्लॉग बताइए।

भारतीय ब्लॉग विश्व स्तर पर छाने में पूरी क्षमता रखते हैं। डिजिटल इंस्परेशन के अपने अमित अग्रवाल को ही लें। उनका ब्लॉग अपनी श्रेणी में पूरे विश्व में नंबर 1 पर है। ओम मलिक का गीगाओम ब्लॉग देखें। उदाहरण कई हैं।

पसंदीदा ब्लॉग भी कई हैं, उनमें से छांटना मुश्किल है, मगर फिर भी हिंदी के ५ छांटने हों तो वो ये होंगे –

प्रश्न: आप क्या सुझाव देंगे उन व्यक्तियों को जो ब्ल़ॉगिंग की शुरुआत करना चाहते हैं?

ब्लॉगिंग टिप्स देने वाले ब्लॉग प्रोब्लॉगर को मैं लंबे समय से फ़ॉलो करता आ रहा हूँ। वेयर हाउस में भारिक (दूसरे अर्थों में हमाल) के रूप में काम करने वाले डेरेन रॉस का सफल, प्रोब्लॉगर बनना एक अचंभित करने वाली घटना है। तो उनके मुताबिक, जो ब्लॉगिंग की शुरूआत करना चाहते हैं और जो इसमें सफल होना चाहते हैं, उनके लिए निम्न सुझाव हैं –

  • नियमित ब्लॉगिंग करें
  • गुणवत्ता पूर्ण ब्लॉगिंग करें
  • जब तक ५०० पोस्ट न लिख मारें, अपने आप को ब्लॉगर न समझें!

प्रश्न: क्या ब्लॉगिंग एक कमाने का जरिया बन सकता है? क्या आपको ब्लॉगिंग से मौद्रिक लाभ होता है?

जी, हाँ बिलकुल बन सकता है। अंग्रेज़ी में तो कई आजीविका चला रहे हैं, कई तो पोस्टें लिखने के लिए लेखक भाड़े पर रखे हुए हैं, और कई मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरियाँ छोड़कर फुलटाइम ब्लॉगिंग कर रहे हैं। अलबत्ता हिंदी में अभी मामला ठंडा-ठंडा सा है। मगर सूरत बदलते देर नहीं लगेगी।

मुझे ब्लॉगिंग से परोक्ष और अपरोक्ष दोनों ही तरह से मौद्रिक लाभ होता है। नियमित राइटिंग असाइनमेंट, विश्वविद्यालय में विजिटिंग लेक्चर्स, पेड वर्कशॉप्स इत्यादि भी ब्लॉगिंग के परोक्ष मौद्रिक लाभ हैं।

प्रश्न: आप के अनुसार, ब्लोगिंग का क्या भविष्य है?

ब्लॉगिंग का भविष्य  उज्जवल है। यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है, जो कभी पुराना नहीं पड़ेगा, कभी ऑब्सलीट नहीं होगा। ओरकुट से, चैट से, फेसबुक से लोग जल्द ही उकता जाएंगे मगर ब्लॉगिंग से नहीं। आने वाले दिनों में नेट से जुड़ा हर बंदा या तो ब्लॉग लिखता होगा या फिर ब्लॉग पढ़ता होगा। यह बात मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं।

प्रश्न: चलिए, अब हमें अपनी कुछ प्रिय चीज़ों से परिचित कराएँ:

रंग: भूरा
चलचित्र: अवतार (राजेश खन्ना वाला नहीं!)
टेलिविजन शो: देख भाई देख (हिंदी में दूसरा वैसा सीरियल अब तक तो नहीं ही बना है, यदि बना हो तो कृपया बताएं, देखना चाहूंगा), फ्रेंड्स
किताब: व्हाई मेन लाई एंड वीमन क्राई
दिन का समय: सुबह ७ बजे, जब चाय का प्याला हाथ में हो और नजर के सामने अख़बार हो।
राशि: ये क्या होता है?

रविशंकर श्रीवास्तव के साथ कनेक्ट करें: ट्विटरब्लॉग

बहुत बहुत धन्यवाद रतलामी जी हमसें बात करने के लिए और अपने व्यंग द्वारा हँसाने के लिए। पाठकों, आपको कैसा लगा हमारा यह प्रयास? ज़रूर बताएं!

15 Replies to “Interview with Ravishankar Shrivastava”

  1. ब्लॉग प्रमोशन वाले सवाल का जवाब सबसे मजेदार रहा। रवि जी तो हमारे पसंदीदा चिट्ठाकार हैं। उनकी लेखनी यूँ ही चलती रहे।

  2. बहुत ही अच्छे सवाल -जवाब रहे……………रवि रतलामी जी इसी तरह आप ब्लॉग्गिंग करते रहे……………..
    आप की ब्लॉग्गिंग से हमें प्रेणना मिलती है…………….एक बात आपने इसमें कही है की जब तक 500 पोस्ट ना लिख ले तब तक अपने आप को ब्लॉगर ना माने…………………….इस बात को मैं अपनाऊंगा और जब तक मैं ५०० पोस्ट ना लिख लू तब तक मैं अपने आप को ब्लॉगर नहीं मानूंगा………

  3. raviji,pahile to badhai. aik lambe sakshatkar ke liye.yadi aap kisi neta ke putrhote to media vale aapko kahan se kahan chadha dete.magar achha hua.aap neta putr nahee ho.aur ravi ratlami ho .HAM jaise logon ke liye aik utprerk,shikshak.ravijee bhagvan aapko swasth rakhe aage kirtimano ko pane ke liye.

  4. रविजी को और रविजी के बारे में पढना मेरे लिए हर बार वर्णनातीत अनुभव होता है। उम्र में मुझसे छोटे हैं किन्‍तु ब्‍लॉग जगत में वे मेरे ‘जनक’ हैं। वे नहीं मिलते तो ब्‍लॉग लिखने की मेरी साध, आजीवन अपूर्ण रहती। मैं उनका, उन्‍होंने मेरे जीवन का एक अधूरापन ही कम नहीं किया, मेरी दुनिया विस्‍तारित भी की। मैं उनका आजीवन आभारी और ऋणी रहूँगा। जिन्‍हें रविजी का सान्निध्‍य, सामीप्‍य और संरक्षण नहीं मिला है, वे मुझसे ईर्ष्‍या करें। ईश्‍वर की मुझ पर यह अतिरिक्‍त कृपा रही कि मैं रविजी के सम्‍पर्क में आया।.

    बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ किन्‍तु भावाकुलता सब कुछ धुंधला किए दे रही है।.

  5. रतलामी जी के बारे में इतनी जानकारी एकसाथ पढकर खुशी हुई। हिन्दी ब्लॉगिंग ऐसे तकनीकी सुदृढ, समर्पित और परिपक्व भागीदारों के योगदान से समृद्ध हुई है।

  6. रवि जी के व्यक्तित्व के कईं अनन्य अनछुए पहलूओं से साक्षात्कार हुआ। अदभुत गुणसम्पन्नता का अहसास हुआ।
    मैं तो इतना ही जानता रहा कि एक वरिष्ट और ख्यात ब्लॉगर है। किन्तु इनका योगदान और अवदान तो स्तुत्य है।
    प्रस्तुत साक्षात्कार परिचय से कहीं अधिक प्रेरणाओं का प्रकाशपुंज है। भावनाएं स्तुत्य है, बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं।

  7. साक्षात्कार को पढ़कर और भी कई जानकारी मिली। शुक्रिया
    रतलामी जी की मदद करने वाली प्रवृत्ति के चलते ही हम जैसे लोग ब्लॉग की कई तकनीकी दिक्कतों को सुलझा पाते हैं। आभार उनका

  8. शानदार इंटरव्यू है। कई बातें नयी पता चली, कई फ़िर से पता चली। कुछ तकनीकी ऊप्पर से निकल गयीं। लेकिन मजा आया इंटरव्यू बांचकर।

    पांच सौ पोस्टें हमने कर ली इसलिये ब्लागर तो हो गये।

    माडरेशन ब्लाग में लगाया नहीं इसलिये संजीदा ब्लागर नहीं हैं।

    रविरतलामी जी कैसे एक गैरसंजीदा ब्लाग को पसंद करते हैं जी। 🙂

    रविरतलामी के बारे में और जानने के लिये उनका साक्षातकार देखें “सीखना है तो खुद से सीखो-रवि रतलामी”

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