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Interview with Anurag Sharma

आज हमारे बीच एक ख़ास शख्स मौजूद है। यह सज्जन भारत के काफी हिस्सों में रहने का लाभ उठा चुके है, और वर्तमान में पिट्सबुर्ग को अपना घर बताते है। बढ़िया कविता करते है, हास्यकर भी है, कहानियाँ सुनाते है, ऑनलाइन रेडियो के संचालक रह चुके है, पढने से ज़्यादा सुनने में विश्वास रखते है, और बहुत अच्छे वक्ता है। वे उर्दू भाषा बोले जाने वाले शहर में १४ साल रहे, अंग्रेजी भाषा का उपयोग होने वाले देश में रहते हैं, और हिन्दी में ब्लॉग करते है – वाह! भाषा के साथ उम्दा रिश्ता बनाया है इन्होने। कहतें है “मेरे जीवन में जीवन कम है, अविस्मरणीय घटनाओं का पुलिंदा ज़्यादा है”। तो क्या आप तैयार है इनकी यादों को ताज़ा कर देने वाले साक्षात्कार को पढने के लिए? तहे दिल से हम अनुराग शर्मा जी, पिट्सबर्गिया, का यहाँ स्वागत करते है।

प्रश्न: आपने ब्लोगिंग की शुरुआत कब और क्यूँ की?

एक समय में इंटरनैट पर भारत के बारे में, खासकर कश्मीर, स्वाधीनता संग्राम जैसे विषयों पर तथ्यात्मक जानकारी की काफ़ी कमी थी। सो सन २००५ में बरेली ब्लॉग और स्मार्टइंडियन शुरू किया। लगभग उसी समय २४ घंटे चलने वाला भारतीय रेडियो पिटरेडियो (पिट्सबर्ग भारतीय रेडियो) भी शुरू किया। लेकिन असली ब्लॉगिंग २००८ में बर्ग वार्ता (पिट्सबर्ग में एक भारतीय) के साथ आरम्भ हुई जिसमें मैने पहली बार अपने आपको अपनी मातृभाषा हिन्दी में अभिव्यक्त किया।

प्रश्न: आप किन विषयों पे अक्सर ब्लॉग करते है?

कविता, कहानी, व्यंग्य, फ़ोटो-फ़ीचर आदि तो हैं ही। यथासम्भव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दे, व्यक्तिगत चरित्र, सद्गुण, स्वाधीनता संग्राम आदि के विषय में भी अपना दृष्टिकोण रखता रहता हूँ। “इस्पात नगरी से” नामक शृंखला में अमेरिका के सामान्य जीवन और स्थानीय मुद्दों की सचित्र जानकारी प्रस्तुत करता हूँ।

प्रश्न: क्या आप कोई पोस्ट लिखते वक़्त उलझ जाते है? ऐसे में आप क्या करते है?

ऐसा होने पर उस विषय को कुछ समय के लिये मुल्तवी करके, बाकी काम जारी रखता हूँ, और मौका मिलते ही बकाया काम को अगली कड़ी में चालू कर देता हूँ। सपनों पर मेरी एक शृंखला काफ़ी समय से अपनी आठवीं कड़ी का इंतज़ार कर रही है। कुछ ऐसा ही हाल देवासुर संग्राम की पड़ताल का चल रहा है।

प्रश्न: आपका लालन-पालन भारत के उत्तर प्रदेश के शहर, बरेली में हुआ है। आपके आस पास उर्दू भी काफी बोली जाती थी। आप यहाँ कितने साल रहे? आप विज्ञान में स्नातक तथा आईटी प्रबंधन में स्नातकोत्तर हैं। यह शिक्षा आपने कहाँ से प्राप्त की? हमें आपके बचपन के बारे में कुछ बताइए।

जी, ब्रजभाषा मिश्रित देशज उर्दू बरेली की आम बोली है। बरेली में मैने अपने प्रारम्भिक जीवन के कुल १४ वर्ष बिताये हैं। छठी कक्षा से बी.एससी तक लगातार बरेली में रहा। स्नातकोत्तर विदेश में किया। बचपन मस्त था। मेरे बचपन के दिनों में पतंग उड़ाकर उनके पेंच लड़ाना बरेली का खास शगल हुआ करता था। कंचे से लेकर क्रिकेट तक सभी चलता था। इन्द्रजाल कॉमिक्स तो शायद ही कोई छूटता हो। दीवाना नामक हास्य पत्रिका में आने वाली “दीवानी चिपकियाँ” लगाकर काफ़ी मज़ा किया है। अच्छे दोस्तों का समूह था, बड़ों का प्यार और दिशा-निर्देशन सदा मिला। कुल मिलाकर बचपन बड़ा खुशगवार था।

प्रश्न: आपने अपने व्यवसाय की शुरुआत एक बैंकिंग सेक्टर से की, और अब आप स्वास्थ्य और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में है। यह व्यवसाय परिवर्तन कैसे और कब हुआ? भारत और पिटस्बर्ग के काम करने के तरीके में क्या आपने कोई अंतर पाया है? बरेली के छोटे शहर से निकल कर पिटस्बर्ग जैसे बड़े शहर में काम करना और रहने का अनुभव पहेले कुछ दिनो/ महीनो में कैसा रहा?

केनरा बैंक में मेरे प्रोबेशनरी ऑफ़िसर बनने के दो साल बाद ही बैंक ने अपने इनहाउस कम्प्यूटरीकरण कार्यक्रम के लिये चुना। मैं दिल्ली आ गया जहाँ से जीवन की दिशा परिवर्तित हो गई। फिर वायटूके समस्या के समय भारतीय सारी दुनिया में पहुँचे, मैं भी हवा में बहकर विदेश पहुँच गया। नौकरी छोडना तय था परंतु देश छोड़ने में दुविधा थी, जो कुछ दुर्घटनाओं ने आसान कर दी। कहानी लम्बी है, संक्षेप में कहूँ तो जीवन में एक समय ऐसा कठिन आया कि भारत छोड़ना मुझे आसान लगने लगा।

पहली बार जब विदेश आया तो देखा कि अंजान लोग भी नज़र मिल जाने पर मुस्कराकर हैलो-हाय करते थे। तब इस अहसास से बहुत गहरा दर्द हुआ कि आम भारतीय कितने बोझ से दबे हैं कि अंजान व्यक्ति के सामने मुस्करा भी नहीं पाते। सड़क पार करते व्यक्ति को देखकर वाहनों की कतारों का चुपचाप रुक जाना हो, चाहे शीशे की बनी दुकानों का शाम को बिना शटर के छोड़ जाना हो, भारत में व्यवस्था और प्रशासन की कमी का अहसास गहराता गया। सहकर्मियों का सहयोग मिला, नये मित्र बने। भारत की कमी खलती है लेकिन व्यवहारिक जीवन में कोई कमी महसूस नहीं हुई

सैद्धांतिक रूप से अमेरिका और भारत दोनों ही अतिशय विविधता वाले देश हैं, साथ ही दोनों समाज व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आदर करने वाले हैं। समृद्धि, सुविधा और प्रशासनिक व्यवस्था यहाँ बेहतर है। एक आम आदमी बेईमानी का स्पर्श किये बिना अपना सारा जीवन आराम से गुज़ार सकता है

प्रश्न: चूँकि आपने भारत और विदेश में काफी समय बिताया है, रहन सहन, व्यवसाय, सुविधाएं, और प्रतिवेश अनुसार, आपको दोनों देशों में से कौनसा देश ज्यादा भाता है? पिट्सबर्ग के भारतीय राष्ट्रीयता के निवासियों में, क्या आपको हिन्दी भाषा का उपयोग नज़र आता है? आप घर में कौनसी भाषा बोलना पसंद करते है? ब्लोगिंग के अलावा, आप भारत से दूर रहकर, कैसे भारत के करीब रहने का प्रयास करते है?

यहाँ घर के लॉन में नियमित आने वाले हिरन, बगिया में कूकने वाले पक्षी, वसंत में चलती हवाओं द्वारा फूलों से लदे पेड़ों से होने वाली पुष्प-वर्षा, दिन में फुदकते खरगोश व शाम को दमकते जुगनू, संस्कृत कवियों द्वारा वर्णित उस भारत की याद दिलाते हैं, जो भारत में भी कम ही दिखता है। यहाँ के जीवन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आदर अधिक है जबकि हमारे यहाँ भौतिक निकटता का।

पिट्सबर्ग ही नहीं, अमेरिका के अन्य क्षेत्रों में भी हिन्दी भारतीयों के बीच सबसे बड़ी सम्पर्क-भाषा है। बल्कि पाकिस्तानी, नेपाली व बांग्लादेशी नागरिकों के साथ जुड़ने में भी हिन्दी का सम्पर्क सूत्र काम आता है। मेरी पत्नी की मातृभाषा हिन्दी नहीं है, लेकिन घर में हम लोग हिन्दी में ही बात करते हैं। नियमित अंतराल पर भारत जाते रहते हैं और जब भारत से बाहर होते हैं, तब भी हमारे हृदय में तो भारत बसता ही है। सभी भारतीय अपने धार्मिक व राष्ट्रीय उत्सव बड़े उल्लास के साथ मिल जुलकर मनाते हैं। क्रिकेट, कैरम आदि की प्रतियोगितायें और सांस्कृतिक कार्यक्रम सामान्य हैं।

प्रश्न: मेरे जीवन में जीवन कम है अविस्मरणीय घटनाओं का पुलिंदा ज़्यादा है – ऐसा आपने २००९ में कहा था, और अपने बढ़ते हुए हर साल के किस्से सुनाये थे। यही सारे किस्से आपने अपनी किताब ‘An Alien Among Flesh Eaters’ में भी प्रस्तुत किये है। क्या यह आपका लेखन उद्योग में पहेला कदम था? हमें आपके उपन्यास ‘बांधों को तोड़ दो’ के बारे में कुछ बताएं। यह किताब किस विषय पर है?

नहीं, वे दोनों पुस्तकें अभी भी अधूरी हैं। मेरी पहली पुस्तक “इंडिया ऐज़ ऐन आइटी सुपरपॉवर: स्ट्रेटेजी फ़ॉर सक्सेस” थी जबकि दूसरी पुस्तक एक काव्य संकलन है। “ऐन एलियन …” एक आत्मकथात्मक उपन्यास है। “बान्धों को तोड़ दो” में स्वाधीनता संग्राम में ज़मीन्दारी, जड़ें और कई जीवन गंवा देने वाले उस परिवार के पलायन, प्रवास और संघर्ष की कहानी है, जिसका गाँव आज़ाद देश के विकास के नाम पर बने बान्ध के लिये डुबा दिया जाता है।

प्रश्न: आप कविताएँ भी लिखते है और उनका पॉडकास्ट भी बनाते है। पतझड़ सावन वसंत बहार, आपके द्वारा संपादित काव्य संग्रह है, जिसका टैगलाइन है ४ मौसम, ६ कवि और २ महाद्वीप! :) ज़ाहिर है आपके साथ साथ काफी कवियों ने इसमें योगदान दिया है। किस प्रकार और शैली की कवितायें इसमें दर्ज है? आपका मानना है की ‘सुनना प्राकृतिक है, पढ़ना नहीं’, इसीलिए आप ऑडियो बुक्स में ज्यादा विश्वास रखते है। भारत में ऑडियो-बुक्स के चलन और प्रगति के बारे में आपकी क्या राय है?

जी, इस संग्रह में मुझे पाँच बहुत सुघड़ कवियों का साथ मिला है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस संकलन की कवितायें चार अलग मूड्स का प्रतिनिधित्व करती हैं। भारत के बाहर पुस्तकों का प्रकाशन कम होता जा रहा है। अमेरिका में एक बड़े प्रकाशक ने पिछले वर्ष दुकान समेटी है। ऐमेज़ॉन पर ईबुक्स की बिक्री ने छपी किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है। ये बदलाव भारत में भी देर-सवेर आने ही हैं। संगीत तो हम सुनते ही हैं। हिन्दयुग्म की ईपुस्तक के बाद कई प्रकाशक आगे आये हैं। इस बार के पुस्तक मेले में ऑडियो बुक्स की काफ़ी संख्या थी। अपनी पोर्टेबिलिटी और सुविधा के कारण वे चलेंगी। हाँ, पुस्तकों का महत्व लम्बे समय तक रहेगा।

प्रश्न: आपने मुन्शी प्रेमचंद जी की तकरीबन २० कहानियों को अपनी आवाज़ दी है, हिन्द-युग्म के आवश्यकता अनुसार। उनकी ढेर सारी प्रस्तुतियों में से आपने सिर्फ यही कहानियां क्यूँ चुनी? क्या आपने मुन्शी जी के अलावा भी किसी लेखक की कहानी या कविता को आवाज़ दी है? आपका अनुभव कैसा रहा, और आपको श्रोताओं से क्या प्रतिक्रिया प्राप्त हुई?

तब ऑडियो बुक एक नई बात थी। कहानियाँ चुनते समय मेरा प्रयास यह था कि कहानियाँ छोटी हों और विषय सामयिक हो। साथ ही लेखक प्रसिद्ध और सर्व-स्वीकार्य हो। अब तक तो मैं और मेरे मित्र मिलकर दो सौ से अधिक कहानियाँ पढ चुके हैं जिनमें प्रेमचन्द के साथ-साथ लगभग सभी छोटे बड़े हस्ताक्षर शामिल हैं। श्रोताओं का प्यार भरपूर मिला है।

प्रश्न: लगता है आपका संगीत और स्वर से खासा संबंध और उसमें रूचि रही है। :) आपने जनुअरी २००५ से ढाई साल तक पिट्सबर्ग से एक हिन्दी ऑनलाइन रेडियो चैनल का सफलतापूर्वक संचालन किया, जिसका उद्देश्य केवल हिन्दी संगीत नहीं, बल्कि समस्त भारतीय संगीत का प्रचार करना था। हम चाहते है कि आप हमारे पाठकों को बताये की पिट-रेडियो की शुरुआत कैसे हुई और यह कितना सफल रहा। हम पिट-रेडियो को फिर कब सुन सकते है? साथ ही आपने ब्लॉग पिट-ऑडियो के बारे में भी कुछ बताये; किस तरह का संगीत आप पेश करते है यहाँ?

हमारे एक घनिष्ठ मित्र अक्सर बिज़नेस आयडिया देते थे, “अनुराग, ऐसा करते हैं …”, एक दिन बोले कि एक एफ़ एम रेडियो शुरू करे? मैने अध्ययन किया तो पाया कि एफ़एम के लिये न तो हमें कई साल तक फ़्रीक्वेंसी मिलती, न संसाधन और न ही कार्यक्रम। मगर विचार मुझे जँच गया। बस, शुरू कर दिया चौबीस घंटे चलने वाला एक ऑनलाइन रेडियो स्टेशन, नाम रखा पिट-रेडियो (इंडियन म्यूज़िक अराउंड द क्लॉक)। अमेरिका में भारतीय संगीत का नाम आने पर बस हिन्दी फ़िल्म संगीत की बात होती थी, सो मैने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि हर प्रकार का भारतीय संगीत सुनने को मिले। हिन्दी, संस्कृत, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मराठी, गुजराती, बांग्ला आदि तो थे ही, मणिपुरी, सिन्धी, तुलू, उडिया, डोगरी, कश्मीरी आदि के अपने साप्ताहिक कार्यक्रम और मिश्रित संगीत भी था। आधे-आधे घंटे के कथानक और सामयिकी आधारित कार्यक्रम भी थे। मित्रों ने दिल खोल कर दुर्लभ से दुर्लभ सीडी ढूंढकर दीं। एक मित्र ने हार्डवेयर अपग्रेड भी कराया। वॉलंटीयर्स ने अमेरिका और भारत से प्रोग्राम बनाकर भेजे। पिट्सबर्ग में कितने लोग अपने कार्यालय, प्रयोगशाला आदि में काम करते समय पिटरेडियो सुनते थे। रेडियो भारतीय गृहिणियों के बीच भी प्रचलित हुआ। यूरोप व पाकिस्तान से भी फ़र्माइशें आती थीं। कुल मिलाकर बहुत अच्छा अनुभव रहा, मगर बहुत थका देने वाला। काम शेयर करने वाला एक वॉलंटीयर भी नहीं मिला। कुछ समय तक न्यूनतम अवलोकन और स्वचालित संगीत-सूचियों के सहारे चलाया और अंततः न चाहते हुए भी मुझे उसे बन्द करना ही पड़ा।

पिट-ऑडियो एक अनियमित ऑडियो ब्लॉग है जिसमें कुछ अलग हट कर संगीत रखने का प्रयास है, प्रसिद्ध कवियों की कवितायें, विनोबा भावे के प्रवचन, लोकगीत, संगीतकारों की आवाज़ में गाये गीत, और राष्ट्रीय पर्वों पर कुछ सामयिक आदि।

प्रश्न: The credit of whatever I am can be passed to this city – आपने ऐसा अपने पहले अंग्रेजी ब्लॉग में जम्मू कश्मीर के बारे में कहा था, जहाँ आपने अपने बचपन का काफी समय गुज़ारा है। आपने काफी समय मनिपुर, महाराष्ट्र, और पंजाब में भी गुज़ारा है। बरेली से लेकर पिट्सबर्ग तक, आपने जिन जगहों की यात्रा की है या संक्षिप्त समय रहे है, उनका आपके स्वाभाव अथवा शिक्षा – दीक्षा में क्या योगदान रहा है, और आपने हर जगह से क्या सीखा है?

मैं सचमुच बड़ा भाग्यशाली हूँ कि मुझे भारत में अनेक स्थानों पर रहने का और वहाँ की विविधता से कुछ न कुछ सीखने का अवसर मिला। मैने पाया कि अनेक विविधताओं के बीच भी भारतीय संस्कृति एक सूत्र में बंधी है। सबसे अच्छी बात थी अपरिचितों के प्रति उनका प्रेम, विश्वास और उत्साह। सब जगह देखने के बाद मेरा यह विश्वास दृढ हुआ कि भारतीयता अमर है। बस फ़िरकापरस्ती और भ्रष्टाचार पर समय रहते नकेल डालने की ज़रूरत है।

प्रश्न: आपके ब्लॉग पर मुहावरों वाला पोस्ट बड़ा रोमांचक था! :) उसी बात पे, आप कुछ मुहावरें ब्लोगिंग जगत पे भी सुना दीजिये। उसके साथ एक हास्य कविता भी हो जाये? :)

जी, शुक्रिया। ये हैं कुछ कथन – कितने निर्धन हैं वे जिनके पास धन के अलावा कुछ भी नहीं है।
खुशी कोई चादर तो है नहीं कि दिल किया तो ओढ ली।
आत्मकेन्द्रित जगत में दूसरों का सत्य घमंड लगता है और अपना कमीनापन भी खरा सत्य।
मैंने जीवन भर अपने आप से बातें की हैं। सच तो सच ही रहेगा, कोई सुने न सुने।
जो जूते बचाने जाते हैं, वे पैर गंवाकर आते हैं।
सुनहरा दिल होना काफी नहीं है, सक्षम पाँव और कुशल हाथ भी चाहिये।

और अब एक पैरोडी:

हम थे जिनके सहारे
उन्ने जूते उतारे…
और सर पे दे मारे
क्या करें हम बिचारे
हम थे जिनके सहारे…

दर्द किससे कहें हम
दर्द कैसे सहें हम
दर्द में क्यों रहें हम
दर्द से कौन उबारे…

हम थे जिनके सहारे…
उन्ने जूते उतारे…
और सर पे दे मारे
क्या करें हम बिचारे
हम थे जिनके सहारे…

प्रश्न: आपके बर्ग-वार्ता के अलावा भी कई सारे ब्लोग्स है। कोई फिल्मों के बारे में, तो कोई स्वास्थ्य के संबंधित है। क्या आप सारे ब्लोग्स पर नियमित रूप से ब्लॉग करते है? बर्ग-वार्ता और स्मार्ट-इंडियन के बाद, इनमें से कौनसा ब्लॉग आपके सबसे करीब है?

बर्ग-वार्ता के बाद अवलोकन मेरा पसन्दीदा ब्लॉग है। निरामिष मुझे अपनी सामाजिक, नैतिक ज़िम्मेदारी के कारण प्रिय है।

प्रश्न: सुना है आप ही की तरह आपकी बेटी भी कविता करती है। क्या आप उसकी मदद करते है कवितायेँ रचने में? अपना खाली समय आप अपने परिवार के साथ कैसे बिताते है?

जी, कभी-कभी हम लोग मिलकर कविता बनाते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है। परिवार के साथ कभी बैडमिंटन खेलना, कभी घूमने निकल जाना, कभी बाग़ीचे में काम करना, पक्षी, खरगोश, गिलहरियों का अवलोकन और कभी आराम से बैठकर पॉपकॉर्न टूंगते हुए कोई ऐनीमेशन फ़िल्म देखना।

प्रश्न: आपने अंग्रेजी और हिन्दी, दोनो भाषाओँ में ब्लोगिंग की है। क्या आपके हिसाब से हिन्दी ब्लोगिंग जगत ने खुदको अंग्रेजी ब्लोगिंग के समान स्थापित कर लिया है? हिन्दी भाषा का प्रयोग, आपके अनुरूप, क्या घटता जा रहा है? अगर हाँ, तो हम क्या कर सकते है उस दिशा में?

हिन्दी में अच्छे ब्लॉग्स खूब हैं, केवल चुटकुले, कवितायें और फ़िल्में नहीं बल्कि तकनीकी, समाचार-विश्लेषण, भोजन, स्वास्थ्य, विज्ञान, आध्यात्मिकता, यात्रा, कार्टून और विषय-विशेषज्ञता वाले भी। और बढ भी रहे हैं। परंतु फिर भी हिन्दी ब्लॉगिंग काफ़ी हद तक मित्रों की चौपाल जैसी है। कई ब्लॉग्स में दिन भर का व्यक्तिगत लेखा जोखा, शिकवे, शिकायतें, तंज या फिर अंतर्जाल पर ही पहले से उपस्थित कृतियों का चेपीकरण किया जा रहा है। टिप्पणियाँ भी लेन-देन की भांति ही चल रही हैं। कुछ लोगों के लिये तो ब्लॉगिंग केवल भड़ास निकालने या अपनी विचारधारा का भोंपू बजाने तक ही सीमित है, जबकि कुछ लोग कमाने के उद्देश्य से आये थे और अब हताश हैं। आम ब्लॉग-लेखकों में तकनीकी जानकारी का अभाव भी एक चुनौती जैसा है। खुशी की बात यह है कि हालात बेहतर हो रहे हैं। मांगने पर सहायता भी उपलब्ध है। सामूहिक ब्लॉग भी लोगों को निकट लाने और उनकी तकनीकी जानकारी में सामूहिक प्रगति करने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग से भाषा समृद्ध हुई है। आंचलिक शब्दों से परिचय बढा है। अनजाने शब्दों के अर्थ समझ आये हैं। विशिष्ट ब्लॉग्स भी हैं जो भाषाई उन्नति में सहायक सिद्ध हुए हैं।

ब्लॉग-अड्डा जैसे स्थल भी हिन्दी ब्लॉगिंग को प्रोन्नत करने और उसे बेहतर बनाने का माध्यम बन रहे हैं।

प्रश्न: आपके लिए ब्लोगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू कौनसा है?

नेटवर्किंग और आत्मविकास। – यह संसार अच्छे लोगों से भरा हुआ है, मगर वे छितरे हुए हैं। ब्लॉगिंग के द्वारा मेरा अगणित अच्छे लोगों से परिचय हुआ जिनमें से कइयों के बाद में साक्षात दर्शन भी हुए हैं।

ऑडियो बुक्स पर काम करना, विनोबा के प्रवचनों का वाचन करते हुए उन्हें समझना, आदि जैसे कामों से मेरा विकास हुआ है। जब अपनी बेकार सी कविता पर भी उत्साहवर्धक और प्रेममयी टिप्पणी देखता हूँ, तो पाठकों की विशालहृदयता का अहसास होता है। इसी प्रकार इतने ब्लॉगर्स के बीच में आपने मुझे साक्षात्कार के योग्य समझा, यह सब देखकर मुझे भी गुण-दर्शन का गुण अपने अन्दर विकसित करने की इच्छा तीव्र होती है।

प्रश्न: भारतीय ब्लोग्स का एक विश्व स्तर पर क्या मूल्य है? अपने पसंदीदा ५ ब्लोग्स बताइए।

भारत कई मामलों में अद्वितीय है। सबसे ऊँची पर्वत शृंखला से लेकर अपना नामधारी एक महासागर और सैकड़ों स्वतंत्र भाषायें किसी अन्य देश के पास नहीं हैं। संसार भारत की ओर बड़ी उम्मीद और आदर से देखता है। महिला ब्लॉगर्स पर न्यूयॉर्क टाइम्स का आलेख हो, या प्रमुख भारतीय समाचार पत्रों में ब्लॉगिंग सामग्री पर नियमित स्तम्भ, यह सब भारतीय ब्लॉगिंग के बढते प्रभाव और गुणवत्ता के सूचक हैं। मैं निम्न पाँच ब्लॉग्स नियमित पढता हूँ:

प्रश्न: आप क्या सुझाव देंगे उन व्यक्तियों को जो ब्लोगिंग की शुरुआत करना चाहते है?

अपना काम गम्भीरता से कीजिये। पठन सामग्री आज भी महत्वपूर्ण है और आगे भी रहेगी।

प्रश्न: क्या ब्लोगिंग एक कमाने का जरिया बन सकता है? क्या आपको ब्लोगिंग से मौद्रिक लाभ होता है?

अवश्य। यदि ब्लॉगिंग समझे बिना केवल कमाने के उद्देश्य से ब्लॉगिंग की जाये, तो लाभ की सम्भावना नगण्य है। सैकड़ों हताश ब्लॉगर इस बात के गवाह हैं। हाँ यदि ब्लॉग सामग्री में दम है तो धन परोक्ष य प्रत्यक्ष रूप से सामने आ सकता है। वैसे कमाने वाले तो ब्लॉग डायरेक्टरी छापकर उन्हीं ब्लॉगर्स को बेचकर भी कमा लेते हैं। मैं ब्लॉगिंग में मौद्रिक लाभ के लिये नहीं आया।

प्रश्न: आप के अनुसार, ब्लोगिंग का क्या भविष्य है?

उज्ज्वल!

प्रश्न: चलिए, अब हमें अपनी कुछ प्रिय चीज़ों से परिचित कराएँ:

अवश्य।

रंग: मेरा रंग दे बसंती चोला …

चलचित्र: सूरज का सातवाँ घोड़ा, त्रिकाल, जाने भी दो यारों, सण्डे (बाल फ़िल्म समिति वाली), डेस्टिनी मैन, हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी

टेलिविजन शो:
पाकिस्तान: काश मैं तेरी बेटी न होती
अमेरिका: जेपर्डी, ज़बूमाफ़ू
भारत: कुछ पुराने कार्यक्रम, जैसे भारत एक खोज, चाणक्य, सुरभि आदि

किताब: ईशोपनिषद, श्रीमदभगवद्गीता, पातंजल योग सूत्र, The Namesake, Kidnapped , The Adventures of Tom Sawyer – Mark Twain

दिन का समय: परिवार के साथ एक सुहानी शाम

राशि: 1 मिलियन डॉलर काफ़ी है – मेरी ज़रूरतें सीमित हैं। :)

अनुराग शर्मा के साथ कनेक्ट करें: ब्लॉगअड्डाब्लॉग

बहुत बहुत धन्यवाद अनुराग जी, इस साक्षात्कार के लिए, और ब्लॉगअड्डा के बारे में प्रशंसनीय शब्द अभिव्यक्त करने के लिए। पाठकों, हमें उम्मीद है आपको अनुराग जी को करीब से जानकार अच्छा लगा। अपने विचार ज़रूर व्यक्त करें। धन्यवाद। :)

 

16 Responses to “Interview with Anurag Sharma”


  1. चि. अनुराग भाई एक बेहतरीन इंसान हैं
    जैसा उनकी सुसभ्य बातों को फोन पर सुन कर अंदाज लगाया था
    उससे बढकर ही पाया जब वे स परिवार हारे शहर में आये और मुझसे मिले थे ..
    स स्नेह आशिष व मेरी भरपूर दुआएं उनके समग्र परिवार के लिए सदैव रहेंगीं
    – लावण्या

  2. anuraag ek achcha insaan jo har bat di se kahta hai,yani dil ki bat kahe dilwala seedhi si bat na mirch masala.bahut hi achcha sakshatkar,bahut si bate janane ko mili anuraag ji ke baare me.dhanyawad aapka bhi ek shandaar shakhsiyat se milwane ke liye.

  3. हम तो गदगदायमान हैं.

  4. आनंद दायक रहा साक्षात्कार पढना, बहुत सी जानकारियाँ मिली अनुराग जी के बारे में| जरूरत पड़ने पर अनुरागजी से आवश्यक मार्गदर्शन हमेशा प्राप्त होता रहा है|
    आपका आभार|

  5. अनुरागजी ने मुझे तो मानो गिरवी रख लिया है। कुछ भी कहूँ, कम ही होगा। वे मरे प्रति मोहग्रस्‍त हैं, मुझे अतिरिक्‍त सम्‍मान देते हैं और यही मेरी कठिनाई है। वस्‍तुत: वे सुन्‍दर आत्‍मा के वाहक हैं इसलिए उन्‍हें सब सुन्‍दर ही दिखते हैं।

    लगे हाथों एक जिज्ञासा। मैं मेरे कस्‍बे में ‘रतलाम रेडियो’ शुरु करना चाहात हूँ। इसके लिए कम से कम कितना खर्च अनुमानित होगा और कितनी जगह लगेगी।

    अनुरागजी पर एक किताब का लिखना उधार चल रहा है। कृपया उनसे कहिए कि यह उधार जल्‍दी से जल्‍दी चुका दें।

  6. dayanidhi vats says:

    बहुत अच्छा लगा यह साक्षात्कार पढकर. हिंदी ब्लॉगिंग में श्री अनुराग शर्मा जी का योगदान सराहनीय है. विविधता से भरे लेखन को पढ़ना एक बेहतरीन अनुभव है.
    वे यूँही लिखते रहें लगातार, यही कामना है.

  7. अनुराग का इन्टरव्यू पढ़ना अच्छा लगा। उनके बारे में और जानकारी मिली। वे एक सुलझे हुए व्यक्ति हैं, उन्हें पढ़ना व उनसे बात करना सदा रुचिकर लगा।
    घुघूती बासूती

  8. Himanshu says:

    खूबसूरत रहा पढ़ना! अनुराग जी का लेखन और उनकी बहुविध प्रस्तुतीकरण हमेशा ही मोहक है।
    बैरागी जी की एक पंक्ति से पूर्णतः सहमत हूँ -“वस्‍तुत: वे सुन्‍दर आत्‍मा के वाहक हैं इसलिए उन्‍हें सब सुन्‍दर ही दिखते हैं।”

  9. अनुराग जी का व्यक्तित्व ऐसा है कि कोई भी मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता.. मुझे गर्व है कि मैं इनका नियमित पाठक हूँ.. आज इनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू से दो-चार होने का मौक़ा मिला, बहुत कुछ जाना..!!

  10. पिट्सबर्ग में अनुराग जी सच में भारत के प्रतिनिधि हैं… लम्बे समय से उन्हें पढ़ रहा हूँ, अनुराग जी एक तरह से सार्थक ब्लोगिंग कर रहे हैं… इस साक्षात्कार से उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला…

  11. अच्छा लगा यह विस्तृत साक्षात्कार पढ़कर …. अनुराग जी के बारे में जानकर …

  12. Avinash says:

    अनुराग जी के बारे में और जानना अच्छा लगा, संतोष होता है कि मैं आज से पहले से इन्हें पढता-जानता रहा हूँ

  13. आप सभी का हार्दिक आभार! मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे सदा अच्छे लोगों का साथ और शुभकामनायें मिली हैं।

  14. श्री अनुराग शर्मा जी का साक्षात्कार पढना अच्छा लगा, साक्षात्कार के माध्यम से उनके व्यक्तिगत जीवन के कई अनछुए पहलुओं से परिचित हुआ,
    आभार……….

    ————————————————
    पी.एस. भाकुनी
    ————————————————

  15. भले व्यक्तिगत रूप से अतिसीमित व सामान्य सा परिचय है अनुराग जी से , भले उनके जीवन के घटनाओं से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ , पर फिर भी मन की बात कहूँ तो लगता है जैसे पूर्णतः जानती हूँ इस व्यक्तित्व को..

    अनुराग जी की परिष्कृत रुचियाँ, उनका महत चिंतन व उत्कृष्ट लेखन क्षमता और उनका अपरिमित ज्ञान, किसी को भी सम्मोहित और नतमस्तक कर सकता है..

    बड़ा ही अच्छा लगा उनके बारे में विस्तार से जानकार..

    ईश्वर उन्हें उनके ध्येय में पूर्ण सफलता दें..समाज को बहुत कुछ देकर जाने का उनका पुनीत लक्ष्य अवश्य पूर्ण हो…

  16. सौरभ says:

    बहुत अच्छा इंटरव्यू

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