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Interview with Ajit Wadnerkar

हमें बहुत ख़ुशी हो रही है ब्लॉगअड्डा का दूसरा हिन्दी इंटरव्यू प्रस्तुत करते हुए। आज हम जिससे आपकी मुलाकात करवा रहें है, वे दैनिक भास्कर के पत्रकार होने के साथ ही, हिन्दी भाषा के जानकार भी है। अपने ब्लॉग शब्दों का सफ़र में, यह शख्स हिन्दी शब्दों के इतिहास और व्युत्पत्ति से हमें परिचित कराते है। हमारे साथ स्वागत करें अजित वडनेरकर का, इस बेहतरीन इंटरव्यू के साथ। जानिए कैसे वे पाठकों को शब्दों के सुहाने सफ़र पर ले जाते है अपने ब्लॉग द्वारा।

प्रश्न: आपने ब्लोगिंग की शुरुआत कब और क्यूँ की?

उत्तर: ब्लॉगविधा के बारे में मुझे २००५ में पता चला। नारद नाम का एक मंच मुझे नेट पर खूब सक्रिय नज़र आया। इसके सदस्य बहुत से विषयों पर आपस में साझेदारी और सम्वाद करते थे। मुझे ब्लॉग में काफ़ी सम्भावना नज़र आई थी सो २००६ में शब्दों का सफ़र नाम से अपना ब्लॉग आखिरकार बना ही लिया। इससे पहले सोशल प्लेटफार्म के नाम पर मैं अपने कुटुम्ब के गूगल-ग्रुप कम्पुकुल का सदस्य था जिस पर बीते सात साल से हम सब परिजन खूब बतियाते हैं।

प्रश्न: आप किन विषयों पर अक्सर ब्लॉग करते है?

उत्तर: मूलतः मैं शब्दों का सफ़र यानी शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना पर ही लिखता हूँ। जैसा की ऊपर बताया कि यह एक बड़ी परियोजना है। जब तक यह पूरी नहीं हो जाती, कुछ और लिखना सम्भव नहीं। फिर भी मैने अपने ब्लॉग पर पुस्तक समीक्षा का स्तम्भ लम्बे समय तक नियमित चलाया। फिलहाल एक साल से यह अनियमित है। इसके अलावा कविता वगैरह अगर लिखी जाती है तो उसे भी अपने पाठकों से साझा कर लेता हूँ। शब्द व्युत्त्पत्ति के अलावा भाषा सम्बन्धी विषयों पर भी बीच बीच में लिखता रहता हूँ।

प्रश्न: क्या आप कोई पोस्ट लिखते वक़्त उलझ जाते है? ऐसे में आप क्या करते है?

उत्तर: ऐसा अक्सर होता है। जब किसी शब्द के जन्मसूत्र का तार्किक विवेचन नहीं हो पाता है तब उलझन होती है। ऐसे में उससे जुड़े तमाम सन्दर्भों को एक जगह रख कर वह फाइल बन्द कर दूसरे शब्द पर काम शुरू कर देता हूँ। मैं एक साथ कई शब्दों पर काम करता हूँ। शब्दों का आपस में अन्तर्सम्बन्ध भी होता है सो पहले कभी जिस शब्द पर अटका था, किसी अन्य शब्द पर काम करते हुए पुराने शब्द की उलझन अचानक सुलझ जाती है। किसी शब्द की व्युत्पत्ति मुझे हिन्दी सन्दर्भों से मिलती है और विवेचना के बीज मराठी ग्रन्थों में मिलते हैं। यह सब बड़ा रोमांचक होता है।

प्रश्न: हमें अपनी किताब ‘शब्दों का सफ़र’ के बारे में कुछ बताये। आपकी अगली पेशकश भविष्य में किस विषय पर होगी?

उत्तर: शब्द व्युत्पत्ति और विवेचना का मेरा काम सामान्य भाषा प्रेमी के लिए है। इस विषय पर भाषाविज्ञान के विद्यार्थियों को ध्यान में रख कर किताबें लिखी जाती रही हैं जो सामान्य हिन्दी प्रेमी के लिए दुरूह हैं। हमारे शब्दकोशों में व्युत्पत्ति के साथ विवेचना नहीं मिलती। शब्दों का सफ़र के ज़रिए मैं बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित १० हज़ार शब्दों पर काम कर रहा हूँ। हिन्दी में अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली, अंग्रेजी, तुर्की, सिंहली आदि भाषाओँ के शब्द समाए हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय बोलियों के हज़ारों शब्द भी हैं। इन शब्दों का मूल क्या है और विकासक्रम में इनमें क्या क्या बदलाव आए, यह जानना बेहद दिलचस्प होता है। शब्द यायावर की तरह होते हैं। एक भाषा से दूसरी भाषा में इनकी घुसपैठ सदियों से जारी है। संस्कृतियाँ और भाषा को समृद्ध करने में इस यायावरी का बड़ा महत्व है। शब्दों का सफ़र ब्लॉग जब शुरू हुआ तब से पाठकों का आग्रह था कि यह किताब के रूप में आए। हिन्दी के कुछ अच्छे प्रकाशकों ने इस काम में दिलचस्पी ली और आखिरकार राजकमल प्रकाशन समूह ने २०१० में इसके पहले पड़ाव को प्रकाशित किया।।

इस पुस्तक का महत्व शब्द-संदर्भ कोश की तरह है। पुस्तक के अंत में अब तक खोजे गए सभी शब्दों की सूची इसे एक व्यवस्थित कोश का रूप देती है। किसी भी शब्द का जन्मसूत्र जानने के लिए सूची में दिए गए पृष्ठ-क्रमांक के जरिये संबंधित आलेख तक पहुँचा जा सकता है। किताब हिन्दी जगत ने स्वागत किया। वरिष्ठ साहित्यकारों ने इसे परखा और अपनी सम्मति दी। इस पुस्तक के दूसरे खण्ड की पाण्डुलिपि को राजकमल प्रकाशन की ओर से एक लाख रुपए का प्रतिष्ठित कृति-पाण्डुलिपि पुरस्कार और विद्यानिवास मिश्र सम्मान प्राप्त हुआ। इस कामयाबी के पीछे मैं ब्लॉग जगत को देखता हूँ। सात महिनों में ही किताब बाज़ार में खप गई और २०११ में इसका पुनर्मुद्रण हुआ। अब २०१२ में शब्दों का सफ़र का दूसरा पड़ाव प्रकाशित हो रहा है। इन दिनों उसमें व्यस्त हूँ। चाहता हूँ कि पहले शब्दों का सफ़र के दस खण्ड पूरे कर लूँ, फिर उपन्यास लिखूँ। कुछ विषय हैं। सबसे पहले पत्रकारों पर लिखूँगा।

प्रश्न: शब्द की तलाश दरअसल अपनी जड़ों की तलाश जैसी ही है – यह आपने अपने ब्लॉग पर कहा है। आपका शब्दों की तलाश का यह सफ़र कब और कैसे शुरू हुआ? और इस तलाश में आप कितने सफल हुए है?

उत्तर: शब्दों के जन्मसूत्रों को तलाशने की मुझे धुन है। ज़िद की हद तक मैं रोज़ इनके पीछे भागता हूँ। इसे जुनून समझ सकते हैं। यह शौक बीते क़रीब तीस साल से है। मैंने १९८५ से आजीविका कमानी शुरू की। इस शौक से जुड़ी सामग्री, ज़ाहिर है वह किताबों की शक्ल में ही थी, जुटानी शुरू की। संवाद माध्यम के रूप में भाषा का इस्तेमाल करने के बावजूद भाषा को अध्ययन के स्तर पर, कठिन विषय समझा जाता है। २००५ में दैनिक भास्कर में साप्ताहिक कॉलम के रूप से शब्दों का सफ़र शुरू हुआ। २००६ तक मुझे लगने लगा था कि लोगों को यह अंदाज़ पसंद आ रहा है और मैंने उसी वर्ष इसी नाम से ब्लॉग शुरू कर दिया।

हिन्दी प्रेमियों ने जिस तरह से इस पहल का स्वागत किया है उसके बारे में इतना कहना ही पर्याप्त है कि व्युत्पत्ति-विवेचना जैसे नीरस विषय के इस ब्लाग पर हर रोज़ हज़ारों भाषा प्रेमी सैर करते हैं। अभी तक इस पर करीब चौदह हजार लोग अपनी प्रतिक्रियाएँ दर्ज करा चुके हैं। दुनियाभर में रहनेवाले हिन्दी भाषियों में शब्दों से, भाषा से और अपनी जड़ों से जुड़ने की ललक मौजूद है, इसका प्रमाण इस ब्लॉग के विदेश में निवास करनेवाले भारतीय पाठकों की तादाद से मिलता है।

प्रश्न: आप पेशे से एक पत्रकार है। हमें अपने इस किरदार और प्रारंभिक जीवन के बारे में और बताएं।

उत्तर: स्कूली जीवन में ही अक्सर हम तय करते हैं कि क्या बनना है। मेरे लिए दो ही चीज़ें खास थीं। या तो पत्रकार बनना है या प्राध्यापक। वैसे स्वभाव और गुण देखते हुए तो मेरी दिली ख्वाहिश थी मैं गायक बनूं पर संसाधन की कमी और हालात को देखते हुए इसे सिर्फ़ सपना ही समझा। :) बचपन से अब तक शरारती हूँ। पहले बातें करना खूब अच्छा लगता था, अब चुप रहना सुहाता है। मेरी पढ़ाई मध्यप्रदेश के राजगढ़ ज़िला मुख्यालय में हुई। यह क़रीब बीस हज़ार की आबादी वाला कस्बा है। पहली क्लास से एमए तक यहीँ रह कर किया। दस साल नवभारत टाइम्स में बिताए। सात आठ साल टीवी मीडिया में काम किया और बीते बारह वर्षों से दैनिक भास्कर में हूँ। हार्डकोर हिन्दी वाला हूँ और इन दिनों भास्कर समूह के मराठी अखबार दिव्य मराठी से जुड़ा हूँ।

प्रश्न: आपने अपने २००९ के एक पोस्ट में कहा है कि हिन्दी पुस्तक संसार में पाठकों का जैसा स्थाई अकाल है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए, आपके हिसाब से क्या कदम लेने चाहिए और उसे कैसे लागू करना उचित होगा?

उत्तर: बीते साठ वर्षों से किताबों की दुनिया में इस समस्या को महसूस किया जाता रहा है। हिन्दी में पाठकों का अकाल नहीं है, किताबों के खरीदारों का अकाल है। जो भी पाठक हैं, उनमें से ज्यादातर तो मुफ्त में किताब पढना चाहते हैं। बौद्धिक सम्पदा और बौद्धिक परिष्कार के लिए हम लोग पैसे खर्च करना नहीं चाहते। मोटे तौर पर तो परिष्कृत मनोरंजन के लिए भी हम कोई भुगतान नहीं करना चाहते। हिन्दी रंगमंच इसीलिए कमज़ोर हुआ क्योंकि लोग टिकट लेकर नाटक नहीं देखते।

इसी तरह किताबें भी मुफ्त में मिलें तो वे पढ़ लेंगे। यहाँ सवाल मानसिकता का है। रीबॉक का जूता खरीदने के लिए दो हजार रुपए जेब से निकलते हैं। यह जूता दो साल में फैंक दिया जाता है, फिर दूसरा खरीदा जाता है। इसके विपरीत २००० रु की पुस्तके तो दूर की बात ५०० रुपए की किताबें भी जीवन भर साथ निभाने वाली होती हैं। इन तथ्यों के मद्देनज़र किताबों के महँगे होने की बातें बेबुनियाद हैं। हिन्दी किताबें ज्यादा संख्या में लोगों तक पहुँचे इसके पीछे प्रकाशक भी दोषी हैं। वे अच्छे प्रकाशनों का प्रचार नहीं करते। बहुत सी चीज़ें एक दूसरे में गड्डमड्ड हैं। जब इन्टरनेट, टीवी जैसी चीज़ें नहीं थीं, लोग तब भी कम पढ़ते थे। अब इन मनोरंजन माध्यमों की भीड़ में किताबों के लिए कितने लोग वक्त निकाल पाते हैं?

प्रश्न: आपने कितने ही पोस्ट में हिंदी शब्दों के जन्मसूत्र और इतिहास की जानकारी अपने पाठकों को दी है। क्या आपने कभी हिंदी भाषा सिखाई है या ऐसा करने की इच्छा रखतें है? क्या आप इन शब्दों के गहराई में अर्थ जानने के लिए कोई उपकरण का प्रयोग करते है?

उत्तर: कोई भी व्यक्ति भाषा के क्षेत्र में पारंगतता का दावा नहीं कर सकता। मैं भी अभी सीख ही रहा हूँ। सीखने की प्रक्रिया के दौरान सिर्फ़ साझेदारी निभाने की ज़िम्मेदारी पूरी करने के लिए ब्लॉग के ज़रिए सबके बीच हूँ। शब्दों का सफ़र की सैर कई लोग रोज़ करते हैं। अपने ब्लॉग पर जो सर्च गैजट लगाया है, उसके ज़रिये लोग पसंदीदा शब्दों की खोज-खबर लेते हैं। अपनी जिज्ञासाएँ व्यक्तिगत रूप से भी मुझसे साझा करते हैं और ब्लॉग पर भी रचनात्मक और विचारपूर्ण टिप्पणियाँ करते हैं। मुझे कभी नहीं लगा कि मैं किसी को कुछ सिखा रहा हूँ। खुशी इस बात की है कि इस ब्लॉग के ज़रिए कई लोगों को शब्द के संसार से जुड़ने के लिए प्रेरित कर पाया हूँ। शब्दों का सफ़र ब्लॉग के पाठकों का इससे जुड़ाव निजी स्तर पर है। अधिकांश पाठक मुझसे व्यक्तिगत रूप से भी जुड़े हैं, चाहे उनसे मैं कभी मिला नहीं हूँ।

जैसा कि मैने कहा, मेरी इच्छा शुरू से कॉलेज में पढ़ाने की थी। उम्मीद है कि इसी जीवन में मुझे शिक्षक बनने का मौका भी मिलेगा। :) शब्दों की गहराई तक जाने के लिए मैं कई शब्दकोशों को टटोलता हूँ। भाषा से जुड़ी कई वेबसाइट्स हैं जिन्हें नियमित रूप से देखता हूँ। दक्षिण एशियाई भाषाओं के सम्बन्ध में शिकागो विश्वविद्यालय की एक डिक्शनरी परियोजना है। उसकी वेबसाइट पर कई शब्दकोश हैं, जिनसे मदद मिलती है। हिन्दी-मराठी-अग्रेजी के करीब दो दर्जन शब्दकोश मैं नियमित रूप से देखता हूँ। मेरे निजी पुस्तक संग्रह में करीब तीन हज़ार पुस्तके हैं जिनमें इतिहास, संस्कृति, समाज, भाषा आदि पर महत्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ हैं। काम की सामग्री मुझे उपन्यासों से भी मिलती है। किसी एक शब्द के मूल तक पहुँचने के लिए मैं उस शब्द के हर मुमकिन आयाम को छूने की कोशश करता हूँ। अब अनुवाद के उपकरण आने से फ्रैंच, जर्मन भाषाओं के सन्दर्भों का अनुवाद अंग्रेजी में हो जाने से काफ़ी मदद मिलती है।

प्रश्न: एन.डी.टी.वि, इकनॉमिक टाइम्स और मेल टुडे जैसे प्रसिद्ध नामों के साथ आपका ब्लॉग जुड़ा है। कई साथी ब्लोगर्स ने भी आपके ब्लॉग और शब्द बोध कि प्रशंसा की है। इस साहचर्य से आपके ब्लॉग को किस तरह बढ़ावा मिला है?

उत्तर: मैने ऊपर कहा है कि शब्दों का सफ़र का स्वागत इस तरह हुआ, जैसे लोगों को उसकी तलाश थी। अब जो भी सबसे पहले चल पड़े। संयोग से यह सेहरा शब्दों का सफ़र के सिर बंधना लिखा था। मेरा सौभाग्य है कि शब्दों का सफ़र पुस्तक और ब्लॉग को साहित्य-पत्रकारिता की दुनिया के कई बड़े नामों ने जाना, समझा, परखा और उसके बारे में लिखा। शब्दों का सफर किताब को कृति पाण्डुलिपि सम्मान मिला। इसकी निर्णायक समिति में नामवर सिंह, अरविन्द कुमार और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे साहित्यकार थे।

ब्लॉग और पुस्तक के बारे में उदयप्रकाश, मृणाल पाण्डे, अरविन्द मोहन, अभय तिवारी, अविनाश, अरविन्द मिश्र, अविनाश वाचस्पति, बलजीत बासी, दिनेशराय द्विवेदी, अशोक पांडे, समीर लाल, प्रियंकर, राजेश प्रियदर्शी, अनूप शुक्ल, ज्ञानदत्त पाण्डे, अनिता कुमार, जाकिरअली रजनीश जैसे कई पत्रकार-ब्लॉगर साथियों ने लिखा। बहुत से और भी खास नाम हैं…इसकी वजह से आज शब्दों का सफ़र की हिन्दी ब्लॉगों में खास जगह बन पायी। इन सबके लिए दिल में खूब सारा सम्मान है।

प्रश्न: बकलमखुद पर आपने अब तक १६ गेस्ट ब्लोगर्स को १०० से ज्यादा गेस्ट पोस्ट के साथ प्रकाशित किया है। किन विषयों पर यहाँ बात-चीत होती है? क्या वे भी आपकी तरह शब्दों के बारें में ज्ञान देते है? हमारे पाठकों को बताएं की बकलमखुद का अर्थ क्या है?

उत्तर: बकलमखुद का मतलब है अपनी कलम से लिखी आपबीती। २००६ में जब मैने ब्लॉग लिखना शुरू किया तो कुछ महिनों में एक बात साफ़ हुई कि ब्लॉगर अपने बारे में कम लिखते हैं। हिन्दुस्तानियों के बारे में कहा जाता है कि उसमें मिलनसारिता कम होती है। अगर इसे सही भी माना जाए तो मैं यह कहना चाहूँगा कि औसत हिन्दुस्तानी जब किसी से जुड़ता है तो सिर्फ़ संवाद के स्तर पर नहीं बल्कि उससे रिश्तेदारी कायम करता है। मोहल्ले-पड़ोस में चाचा, बुआ और मामा जब तक नहीं बनते, मेल-जोल का आनंद अधूरा रहता है। तो वर्चुअल दुनिया में भी इस हिन्दुस्तानियत की मुझे कमी लगी। ब्लॉगरों ने दो-तीन लाइनों में अपना परिचय दिया हुआ था। लोग जानना चाहते थे कि इतना अच्छा लिखने वाला व्यक्ति निजी ज़िंदगी में क्या करता है, कौन है…वगैरह वगैरह।

इन्हीं सवालों को लेकर मुझे लगा कि अगर बकलमखुद जैसा कॉलम शुरू किया जाए तो शायद बेहतर ही होगा। बस, २००७ में यह काम मुम्बई की ब्लॉगर-प्राध्यापक अनिता कुमार से शुरू हुआ। लोगों ने इस पहल का भरपूर स्वागत किया। इस ब्लॉग को कई लोगों ने तो सिर्फ़ बकलमखुद की वजह से ही पहचाना और उसके बाद उनकी दिलचस्पी शब्दों में भी शुरू हुई। बकलमखुद में हिन्दी की कई बड़े ब्लॉगरों ने एक तरह से अपनी संक्षिप्त जीवनकथा लिखी है। कुछ इस अंदाज़ में कि जिससे लोग उनके ब्लॉगर क़िरदार के बारे में जान सकें। खुद के बारे में लिखना बहुत मुश्किल होता है मगर मैं आभारी हूँ सफ़र के इन सभी साथियों का जिन्होंने मेरे आग्रह का सम्मान रखते हुए अपने बारे में बिन्दास तरीके से बहुत कुछ सबके साथ साझा किया। बकलमखुद बीते एक साल से बन्द है। जल्दी ही यह फिर शुरू होगा।

प्रश्न: आपका हिंदी ब्लोगिंग के लिए क्या दृष्टिकोण है? अपने ब्लॉग के ज़रिये, आप हिंदी ब्लोगर्स के लिए क्या करना चाहेंगे?

उत्तर: मैं २००६ से ब्लॉगर हूँ और ब्लॉगिंग मुझे उत्साहित नहीं कर पा रही है, इसके बावजूद ब्लॉगिंग छोड़ नहीं सकता। हिन्दी का सृजनधर्मी समाज सम्भवतः अपनी खूबियों से परे खामियों के साथ यहाँ मौजूद है। हम ब्लॉगिंग की प्रकृति को ही समझ नहीं पाए हैं। ब्लॉगिंग के मूल स्वरूप से हटकर कहीं न कहीं इसे साहित्य और पत्रकारिता का कलेवर देने का प्रयास किया जाता रहा है। संघ-सम्मेलन जैसी गतिविधियों के ज़रिये ब्लॉगर खुद को महिमंडित करने लगा है। प्रिन्ट मीडिया में सृजनधर्मियों के लिए कम होते अवसरों का लाभ ब्लॉगविधा को मिलना था, पर हम उसका लाभ नहीं ले पाए। हालाँकि कई लोगों की निजी प्रतिभा ब्लॉगिंग की वजह से जिस तरह उजागर हुई है, वैसा उभार उन्हें बरसों में नहीं मिला था। निजी तौर पर मेरे लिए ब्लॉगिंग डाक्युमेंटेशन का माध्यम है।

प्रश्न: अंग्रेजी एक विचित्र भाषा है, यह वाक्य बहुत लोकप्रिय है, चूँकि एक ही शब्द के अनेक मतलब निकलते है। क्या हिंदी भाषा में भी ऐसे शब्द है? आपके हिसाब से क्या हिंदी भी विचित्र भाषा कहलाई जा सकती है?

उत्तर: मेरी निगाह में हर भाषा विचित्र है। हर भाषा का अपना तिलस्म है। हर भाषा की अलग फैंटेसी है। हर भाषा का अपना अलग जादू है, मायाजाल है। यही सारी बातें किसी भी भाषा को खूबसूरत, अभिव्यक्ति सम्पन्न और विचित्र बनाती हैं। हिन्दी में भी ये तमाम खूबियाँ हैं। दरअअसल अंग्रेजीदाँ और गैरअंग्रेजीदाँ, दोनों ही किस्म के लोग अंग्रेजी से बहुत प्रभावित हैं और इसे करिश्माई ज़बान मानते हैं। अंग्रेजी की अपनी खूबियाँ हैं और हिन्दी की अपनी। दोनों एक दूसरे की जगह नहीं ले सकती। अर्थ की दृष्टि से हिन्दी में एक ही शब्द के इतने ज्यादा अर्थ हैं कि ताज्जुब होता है। जैसे नन्द का अर्थ हिन्दी में खुशी, प्रसन्नता भी है। पुत्र भी है और एक खास किस्म का घर भी है।

प्रश्न: पत्रकारी में और निरंतर ब्लोगिंग करने के बाद, बाकी समय आप अबीर और अन्य लोगों के साथ कैसे बिताते है? आपके ब्लोगिंग और गायकी के अलावा और क्या शौक है?

उत्तर: इसके बाद वक्त ही कहाँ बचता है। :) अबीर अब सीए बनने की राह पर है, सो उसके पास भी वक्त की कमी है। :) छुट्टी के दिन हम सब साथ होते हैं। फिलहाल तो मैं एक साल से औरंगाबाद में हूँ और एक डेढ़ महिने में एक बार भोपाल जाता हूँ। संगीत का शौक सिर्फ़ सुनने भर तक सीमित रह गया है। पहले महफ़िल जमा लेते थे। :) किताबें पढ़ने का खूब शौक है और सफ़र के अलावा लगातार किताबें पढ़ता रहता हूँ। जैसे ही किसी शब्द के बारे में कुछ नया विचार आता है तो बेसाख्ता तालियाँ बजाने लगता हूँ या फ़ौरन एक सिगरेट पी लेता हूँ। :) मुझे लम्बी ड्राइविंग अच्छी लगती है। नए नए इलाकों में जाना, घूमना अच्छा लगता है, पर इन सबके लिए वक्त नहीं मिल पाता। हाँ, शब्दों के अलावा जो दूसरी सनक है वह है खाना बनाना। रोज़ अपने हाथ से खाना बनाना और खिलाना बहुत पसंद है। शब्दों का सफ़र के बाद हो सकता है ज़ायके का सफ़र ब्लॉग भी भविष्य में शुरू कर दूँ। :)

प्रश्न: हमें एक हिंदी शब्द बताएं जिसका आप बहुत प्रयोग करते है और आपको वह क्यूँ पसंद है।

उत्तर: बढ़िया सवाल पर मुश्किल है इसका जवाब। कोई एक शब्द बताया नहीं जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग शब्दावली होती है और वह चुने हुए शब्दों का प्रयोग करता है। कुछ ख़ास शब्दों का इस्तेमाल करना व्यक्ति विशेष की पहचान भी बन जाती है। अलग अलग सन्दर्भों में अक्सर उन शब्दों का प्रयोग होता है। गिनाना ही चाहूँ तो इस्तेमाल, यायावरी, ज़ाहिर है, चस्पा, उजागर, सिफ़त वगैरह शब्दों का अक्सर इस्तेमाल होता है।

प्रश्न: क्या आप अपने ब्लॉग को प्रमोट करते है? आप कौनसे प्रमोशनल माध्यमों का उपयोग करते है?

उत्तर: मुझे बहुत कम वक्त मिल पाता है। कई ब्लॉग देखता हूँ जिनकी साजसज्जा, लेआऊट बहुत सुन्दर है। मैं इस पर भी बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता। अपने ब्लॉग को लोकप्रिय बनाए जैसे टिप्स अक्सर निगाहों से गुज़रते हैं, पर इन पर अमल करने में खुद को नाकाबिल पाता हूँ। प्रमोशन के नाम पर सिर्फ़ ट्विटर और फ़ेसबुक ही ज़रिया है जहाँ अपनी पोस्ट की सूचना देता हूँ।

प्रश्न: कितना ज़रूरी है एक ब्लॉगर का अपने पाठकों से संवाद करना? क्या आप अपने सारे कमेंट्स का उत्तर देते है?

उत्तर: संवाद तो जीवन के हर क्षेत्र में ज़रूरी है। मगर अपने ब्लॉग को प्रमोट करने के बारे में अक्सर कहा जाता है कि कमेंट्स का उत्तर देना चाहिए, दूसरे ब्लॉग्स पर नियमित जाना चाहिए, वहाँ भी कमेंट करना चाहिए…यह सब ज़रूरी नहीं है। कम से कम मेरे लिए यह सब करना मुमकिन नहीं हो पाता। मैं कई ब्लाग पढ़ता हूँ, कई को सब्स्क्राइब किया हुआ है। कई लोगों से अक्सर फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए बात होती रहती है। मेरी लम्बी गैरहाज़िरी के बावजूद मुझे नहीं लगता कि लोगों की सफ़र में दिलचस्पी कम हुई है। रचनात्मक कमेन्ट्स का मैं ज़रूर उत्तर देता हूँ। हर प्रतिक्रिया का जवाब दिया भी नहीं जा सकता और अपने सभी पसंदीदा ब्लॉग्स पर रोज़ फेरा लगाना भी सम्भव नहीं है। शब्दों का सफ़र नियमित चलता रहे, मेरे लिए यह सबसे ज़रूरी है। मेरे पास जो वक्त है, वह अपनी इस मुहीम के लिए है।

प्रश्न: आपके लिए ब्लोगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू कौनसा है?

उत्तर: लगातार अपडेट करते रहने की सुविधा और फौरन प्रतिक्रिया का मिलना।

प्रश्न: भारतीय ब्लोग्स का एक विश्व स्तर पर क्या मूल्य है? अपने पसंदीदा ५ ब्लोग्स बताइए।

उत्तर: दुनियाभर में हिन्दी भाषा हैं और वहाँ उनकी पहचान की बड़ी वजह भारत के साथ साथ हिन्दी भी है। एक तमिलभाषी की अमेरिका में पहचान तमिल की वजह से नहीं, भारत और हिन्दी की वजह से है। पहले सिर्फ़ अंग्रेजी पर आश्रित टीवी चैनलों का व्यवसाय अब हिन्दी आधारित हो गया है। इसमें कोई शक नहीं कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी अपनी शौक, अभिरुचि के अनुसार हिन्दी ब्लॉग्स पढ़ना पसंद करते हैं। शब्दों का सफ़र की शुरुआती हौसलाअफ़ज़ाई में विदेशों में बसे भारतीय ब्लॉगर ही थे।

मेरे लिए सिर्फ़ किन्हीं पाँच ब्लाग्स का नाम लेना कठिन है। मेरी ब्लॉगसूची में जितने भी ब्लॉग फिलहाल हैं, उससे भी बड़ी सूची है मेरे पसंदीदा ब्लॉग्स की। अनूप शुक्ल, ज्ञानदत्त पाण्डेय, शिवकुमार मिश्र और प्रमोद सिंह को मैं धाँसू ब्लागर की श्रेणी में रखता हूँ। इनके जैसा कोई नहीं।

प्रश्न: आप क्या सुझाव देंगे उन व्यक्तियों को जो ब्लोगिंग की शुरुवात करना चाहते है?

उत्तर: जो कुछ अब तक अनकहा, अनसुना रहा है ज़िंदगी में, उसे कह डालिए। ऐसी साझेदारी और ऐसे साझेदार कहीं और नहीं मिलेंगे। :)

प्रश्न: क्या ब्लोगिंग एक कमाने का जरिया बन्न सकता है? क्या आपको ब्लोगिंग से मौद्रिक लाभ होता है?

उत्तर: मैने आज तक ब्लॉग के ज़रिये कमाई के बारे में नहीं सोचा। जैसा कहा जा रहा था, ब्लॉगिंग कमाई का ज़रिया बन सकती है, बीते छह वर्षों में किसी हिन्दी ब्लॉग ने ऐसी मिसाल कायम नहीं बनाई कि ब्लॉगिंग के दम पर गुज़र-बसर हो सकती है। वैसे भी ब्लॉगिंग से कमाई करने के लिए इस पर खास तौर पर ध्यान देना होगा जो कि सम्भव नहीं है।

प्रश्न: आप के अनुसार, ब्लोगिंग का क्या भविष्य है?

उत्तर: ब्लॉगिंग को अभी बहुत आगे जाना है। यह फ्यूचर मीडिया है। संवाद का, अभिव्यक्ति का जबर्दस्त और सफल माध्यम। वर्डप्रेस या ब्लॉगर या दूसरे प्लेटफार्म अपनी सुविधा बन्द भी कर दें तो मुझे यक़ीन है कि लोग खुद अपने डोमेन पर जाएँगे और ब्लॉगिंग करेंगे। क्योंकि इसने अभिव्यक्ति की जो आज़ादी है, वैसा दूसरे किसी माध्यम पर सम्भव नहीं है। ब्लॉगिंग को अभी और आगे जाना है, और रचनात्मक होना है।

प्रश्न: चलिए, अब हमें अपनी कुछ प्रिय चीज़ों से परिचित कराएँ:
रंग: नारंगी, काला
चलचित्र: राजकपूर की सभी फिल्में
टेलिविजन शो: बिगबॉस
किताब: सामर्थ्य और सीमा (भगवती चरण वर्मा), नाच्यो बहुत गोपाल (अमृतलाल नागर), फ्रीडम एट मिडनाइट (लैरी कॉलिंस, डोमिनिक लॉपियरे), हिन्दी निरुक्ति (आचार्य किशोरीदास वाजपेयी), अनामदास का पोथा (हजारी प्रसाद द्विवेदी) और न जाने कितनी किताबें इस सूची में जुड़ सकती हैं। :)
दिन का समय: मेरे पास दिन नहीं है। मुझे रात एक बजे से सुबह चार बजे के बीच का वक्त बहुत पसंद है। तब मैं शब्दों का सफ़र पर रहता हू। :)
राशी: पता नहीं। मेरा इसमें भरोसा नहीं। :)

बहुत बहुत धन्यवाद अजित जी इस इंटरव्यू के लिए। प्रिय पाठक, हमें उम्मीद है की आपको हमारा यह प्रयास पसंद आया। आपके विचार हमें कमेंट्स द्वारा ज़रूर बताएं। :)

अजित वडनेरकर के साथ कनेक्ट करें: ब्लॉगअड्डा, ट्विटर, ब्लॉग.

10 Responses to “Interview with Ajit Wadnerkar”

  1. बेहतरीन सवालों और उन के बेहतरीन जवाबों वाला साक्षात्कार। लेने वाला और देने वाला दोनों ही बधाई के पात्र हैं।

  2. वडनेरकर जी के साक्षात्कार में भी वही चिरपरिचित सादगी वही खोजी भाव और मुग्ध करती वही शैली जो कि ब्लाँग की एक एक पोस्ट से परिलक्षित होती है ! अभिभूत कर दिया ! अत्यंत सारगर्भित और सुरुचिपूर्ण !

  3. anitakumar says:

    अजित जी आप के इस साक्षात्कार में अपना नाम भी पा कर अभिभूत भी हूँ, कृतज्ञ भी हूँ और सबसे ज्यादा हैरान भी हूँ। ‘शब्दों का सफ़र’ ब्लोग हमारी बौद्धिक पिपासा को काफ़ी हद्द तक तृप्त करता है और भाषा का ज्ञान तो बढ़ता ही है। किताब के रूप में पा कर तो आनंद दुगुना हो गया है।
    इस साक्षात्कार से पहले मुझे पता नहीं था कि ब्लॉग अड्डा ने हिंदी में भी पोस्ट निकालनी शुरु कर दीं हैं। अब नियमित रूप से पढ़ेगें। बकलम खुद लिखना एक बहुत ही आनंददायी अनुभव रहा। काश हम पर कोई सीमा न बांधी गयी होती:)

  4. बहुत रोचक, आत्मीय साक्षात्कार। आनन्दित हुये पूरा बांचकर।

    आपकी सब तमन्नायें पूरी हों। दस किताबें लिखें फ़िर उपन्यास। इस बीच मास्टरी भी मिल जाये। और गायकी भी चलती रहे-माचिस की डिबिया के तबले पर। :)

    जय हो ! :)

  5. अजित भाई का साक्षात्कार पढ़कर बहुत अच्छा लगा. उनका ब्लॉग शब्दों का सफ़र हज़ारों लोगों का पसंदीदा ब्लॉग है. हिंदी ब्लॉगिंग की बात ज्यादातर शब्दों के सफ़र से ही शुरू होती है और उनका यह ब्लॉग मेरेलिए सबसे बढ़िया हिंदी ब्लॉग है.

  6. ब्लॉग विधा का हिंदी में इससे बेहतरीन उपयोग मिलना मुश्किल है.. अजीत जी वाकई बधाई के पात्र हैं जो हिंदी ब्लॉग जगत में आज अपना अलग स्थान बना चुके हैं… अजीत जी को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें…

  7. mahendra says:

    nice interview…..

  8. रोचकता और सादगी के साथ एक उपयोगी साक्षात्कार। `शब्दों का सफर’ सच में लगन का ही कमाल है। प्रस्तुति के लिए बधाई !

  9. सच में अजित जी ने बहुत कुछ किया है —और आगे भी उनसे यही उम्मीद है। अजित जी के साथ ही ब्लागअड्डा टीम को भी हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

  10. admin says:

    @दिनेशराय: प्रश्नों की प्रशंसा करने के लिए धन्यवाद। :)
    @सक्सेना जी @ अनीता जी @अनूप @मिश्रा जी @महेंद्र @कविता: हमें ख़ुशी है आपको इंटरव्यू पसंद आया।
    @हेमंत: शुभकामना के लिए धन्यवाद। :)

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