Interview with Kirtish Bhatt

आज हम, आपके अड्डे पर, आपके लिए कुछ नया लेकर आए है। जैसे आप देख सकते है, हम हिंदी में लिख रहे है। आज ब्लॉगअड्डा और उसके पाठकों के लिए बहुत ख़ास दिन है, क्यूँकी हम अपना पहला हिंदी ब्लॉग पोस्ट और इंटरव्यू आपके सामने पेश कर रहे है। 🙂 जी हाँ, एक इंटरव्यू पूरी तरह से हिंदी में लिखा गया। चूँकि आज हम हिंदी में बात करेंगे, ज़ाहिर है की जिनका हमने इंटरव्यू लिया है, वो एक हिंदी ब्लॉगर ही है। इंदौर की नईदुनिया नामक एक प्रसिद्ध अखबार में यह शख़्स, बतौर एक हिंदी कार्टूनिस्ट और साथ ही साथ एक ग्राफिक डिजाईनर का काम करते है।

राजनीतिक व्यंग इनकी पसंद है और दिग्विजयसिंह और मायावती को वे चलता फिरता कार्टून मानते है। 😛 बहुत ख़ुशी से हम बामुलाहिजा ब्लॉग के कीर्तीश भट्ट जी का ब्लॉगअड्डा में स्वागत करते है, इस बेहतरीन इंटरव्यू के साथ। हमने यह नम्र प्रयास किया है इस शैली में, तो आप इस इंटरव्यू को ज़रूर पढ़ें और हमें बताएं की हम अपने प्रयास में कितने सफल हुए हैं। 🙂 हमें आशा है की आपको यह इंटरव्यू पसंद आएगा। अपने मूल्यवान विचार ज़रूर कमेंट्स के द्वारा में हमें बताएं।

प्रश्न: आपने ब्लोगिंग की शुरुआत कब और क्यूँ की?

उत्तर: ब्लोगिंग की शुरुआत मैंने २००७ में की थी। इसके पहले तक में एडवरटाईजिंग एजंसी में ग्राफिक डिजाईनर के साथ साथ एक समाचारपत्र में बतौर कार्टूनिस्ट काम कर रहा था। लेकिन किन्ही कारणवश मुझे समाचारपत्र छोड़कर पूरीतरह एडवरटाईजिंग एजंसी से जुड़ना पड़ा। चूँकि अब मेरे कार्टून किसी समाचारपत्र में नहीं छप रहे थे, तो मैंने उन्हें ब्लोगिंग के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने के उद्देश्य से, ब्लोगिंग की शुरुआत की थी। इसके पहले मैंने अपने कार्टून की वेबसाईट बनाने के बारे में सोचा था, और बाकायदा डोमेन भी बुक किया था। लेकिन उस वक़्त वेब पर रोज़ कार्टून अपडेट करना न व्यवहारिक रूप से और ना ही तकनीकी रूप से मेरे लिए संभव था, तब मेरे उस वक़्त के एक साथी कॉपीराइटर ने मुझे ब्लॉग का सुझाव दिया था। ब्लॉग के बारे में सुना तो था उस वक़्त, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसके कहने पर प्रयोग के बतौर मैंने अपना ब्लॉग बनाया ‘बामुलाहिजा’।

प्रश्न: आप किन विषयों पे अक्सर ब्लॉग करते है?

उत्तर: ब्लॉग पर में सिर्फ कार्टून तक सिमित हूँ, लिहाज़ा मेरे ब्लोगिंग का विषय वही होगा जो मेरे कार्टून का। मेरे कार्टून के विषय निर्भर करते हैं उस दिन के समाचारों पर। आमतौर पर कार्टूनों का विषय राजनितिक ही होता है, लेकिन राजनीती से परे भी यदि कोई बड़ी घटना या समाचार होता है तो उस दिन के कार्टून का विषय वह होता है।

प्रश्न: क्या आप कोई पोस्ट लिखते वक़्त उलझ जाते है? ऐसे में आप क्या करते है?

उत्तर: आप जो कार्टून ब्लॉग पर देखते हैं वे मैं एक दिन पहले अख़बार में छपने के लिए बनाता हूँ और उन्हें जस का तस अगले दिन ब्लॉग पर पोस्ट करता हूँ। तो मेरी जो भी उलझने होती है वे कार्टून बनाने के दौरान होती हैं। उलझन समाचारों को लेकर होती है। पहले हम आज अख़बार में प्रकाशित हो चुके समाचारों का विश्लेषण कर उनपर अगले दिन का कार्टून बनाया करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। कार्टूनिस्टों पर एकदम ताज़ा  समाचारों पर कार्टून बनाने का दबाव रहता है। न चाहते हुए भी कई बार मुझे अच्छे कार्टून आइडिया को ड्रॉप कर देना पड़ता है क्योंकि जिस घटना पर में कार्टून बना रहता हूँ, पता चलता है कि एन वक़्त पर उसमें कोई नया मोड़ आ गया है। इन्टरनेट और टीवी पर पल-पल अपडेट होती खबरों से तालमेल बैठाना कई बार पेचीदा काम लगता है।

प्रश्न: बामुलाहिजा पे आपके हास्य भरे कार्टून्स, बड़ी ही मजेदार टिप्पणी करते है हमारे देश की सरकार और राजनीति पर। जहाँ आजकल के दौर में हम निरंतर तनाव और चिंता से घिरे रहते है, वहीं आपके रोचक कार्टून्स हमें हँसा देतें है और हमें सोच विचार में डाल देते है। इस चिंता और तनाव के बावजूद, आप कैसे इतना बढ़िया व्यंग प्रस्तुत करते है? अपने कार्टून्स के द्वारा, आप किन भावनाओं को उभारने का प्रयास करते है?

उत्तर: जिस तरह आप काम करते हैं उसी तरह मेरे लिए ये भी ये काम है, इसके लिए मुझे कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करने होते हैं। कुछ तो बचपन से बुद्धि ही ऐसी है कि चीजों और घटनाओं को अलग नज़रिए से देखने की आदत हो गयी है और कुछ काम करते हुए खुद को ऐसा ढाल लिया है कि रोज़ शाम को ६ बजे तक कम से कम ३ कार्टून के आइडिया तो दिमाग से निकल ही आते हैं। कुल मिला कर डिफाल्ट सेटिंग है। जहाँ तक भावनाओं का सवाल है तो वे रोज़ बदलती है, किसी दिन आपको मेरे कार्टून में आम आदमी की भावनाएं देखने को मिलेगी, तो किसी दिन भ्रष्ट नेता की, कभी अमीर की तो कभी गरीब की, कभी पुलिस के तो कभी चोर की यहाँ तक कि टेबल कुर्सी और कार जैसी बेजान चीजों के भावनाएं भी।

प्रश्न: हमें बताएँ की आपकी दिलचस्पी कार्टूनिंग और ग्राफिक डिज़ाइनिंग में कब और कैसे शुरू हुई? क्या आप किसी से प्रेरित हुए थे? आप नईदुनिया में ग्राफिक डिज़ाइनर और कार्टूनिस्ट, दोनों की भूमिका निभाते है। किन्तु इन दोनों के बीच, आप किस काम में अधिक रूचि रखते है और क्यूँ?

उत्तर: शुरू से मेरे घर में पढाई लिखाई का अच्छा माहौल रहा है। मुझे याद है जब में शायद पाचवीं या छठीं में था, तबसे मैं नियमित अख़बार पढ़ता रहा हूँ। जाहिर सी बात है कि अखबारों में छपने वाले कार्टून औरों की तरह मुझे भी बड़े आकर्षित करते थे। थोडा बहुत चित्र वगैरह बनाने का शौक मुझे था, लेकिन कभी कार्टून बनाने या कार्टूनिस्ट बनने का ख्याल कतई दिमाग में नहीं था। कार्टून बनाने के पीछे किस्सा यह है कि उन दिनों, एक अखबार, पाठकों के बनाये कार्टून प्रकाशित करता था। चूँकि मेरी भी अक्सर समाचारों और कार्टूनों पर नज़र रहती थी, तो मेरे दिमाग में भी कोई कार्टून आया। अपने पहले ही प्रयास में मुझसे जो आढ़ा-टेढ़ा कार्टून बना, वो बनाकर उस अख़बार में भेज दिया।

किस्मत से वो कार्टून हफ्ते भर बाद उस अखबार में छप गया। उस पल कार्टून ने मेरे अन्दर वो उत्साह पैदा किया, कि मैं तबसे लगातार कार्टून बना रहा हूँ। और सुखद संयोग रहा कि जिस अख़बार ने मेरा पहला कार्टून छापा, वर्षों बाद उसी अख़बार में बतौर स्टाफ कार्टूनिस्ट मैंने लम्बे समय तक काम भी किया।

ग्राफिक्स डिजाईनिंग से जुड़ने का कारण भी कार्टून ही रहा। उस वक़्त कुछ राष्ट्रिय पत्रिकाओं में कंप्यूटर की मदद से बनाये बेहतरीन कार्टून मैंने देखे थे, लिहाज़ा मैंने भी यही सोचकर इसके लिए डिप्लोमा कोर्स ज्वाइन किया। डिप्लोमा के दौरान ही इन्फो ग्राफिक और डिजिटल इलस्ट्रेशन  जैसी चीजों से भी मेरा परिचय हुआ जिनकी विज्ञापन एजेंसियों और समाचार पत्रों में काफी मांग थी और आज भी है। नईदुनिया से में बतौर ग्राफिक डिजाईनर ही जुड़ा था और मेरे प्रोफाइल में कार्टूनिस्ट होने की बात भी लिखी थी, लिहाज़ा नईदुनिया के तत्कालीन संपादक ने मुझे वहां कार्टून बनाने को भी कहा। बाद में मेरी उपाधि बदलकर ‘कार्टूनिस्ट’ कर दी गयी, लेकिन अपनी रूचि और संपादकों की इच्छा अनुसार में ग्राफिक्स और डिजाईन का काम भी देखता हूँ। हालांकि रोज़मर्रा के डिजाईन और ग्राफिक के लिए अब टीम के अन्य साथियों का साथ रहता है इसलिए ज्यादा ध्यान कार्टून्स पर दे पाता हूँ। बड़ी घटनाओ या अवसरों पर ग्राफिक या इन्फोग्राफिक्स के लिए मुझे भी टीम में इन्वाल्व होना पड़ता है, अन्यथा नहीं।

प्रश्न: हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। फिर भी क्या आपको लगता है, कि हिंदी कार्टूनिस्ट और लेखकों को महत्व नहीं दिया जाता? अगर हाँ, तो आपकी नज़र में उसका क्या कारण और समाधान हो सकता है? आप हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओँ में कार्टून बनाते है, पर आपके पाठक कौनसी भाषा में आपके कार्टून्स पसंद करते है? देश के कौनसे भाग में हिंदी कार्टून्स की सबसे ज्यादा मांग है?

उत्तर: हिंदी भाषा और लेखकों के बारे में बोलने के लिए मैं बहुत छोटा हूँ। रही बात महत्व की तो मुझे तो ऐसा नहीं लगता। माध्यमों का व्यवसायीकरण हो गया है लिहाज़ा वही बिकेगा जो अच्छा होगा और पढ़ने देखने वालों कि पसंद का होगा। नीरस, बोझिल और घटिया लेखन हिंदी क्या किसी भी भाषा में नहीं पढ़ा जाएगा। यही बात कार्टून पर भी लागू होती है। में अंग्रेजी में कार्टून नहीं बनाता हूँ, दरअसल वे मेरे हिंदी कार्टूनों का अनुवाद होते हैं जो में गैर हिंदी पाठकों तक पहुँचने के लिए करता हूँ। मूलतः मैं हिंदी कार्टूनिस्ट ही हूँ और मेरे कार्टून हिंदी में ही ज़्यादा पसंद किए जाते हैं। जहाँ तक मांग का प्रश्न है तो जाहिर है जहाँ हिंदी पढ़ने वाले होंगे वही इसकी मांग ज्यादा होगी। बामुलाहिजा से मेरे कार्टून का प्रसार या यूं कहें कि इस पर आने वाला ट्राफिक सबसे ज्यादा उत्तर-पश्चिम भारत से होता है।

प्रश्न: कार्टून्स लगभग सभी लोग पसंद करते है। फिर भी, भारत में १५ साल से सिर्फ एक ही कार्टून पत्रिका है, जो है ‘कार्टून वाच‘। आपका भी इस पत्रिका में योगदान रहा है। आप के अनुसार, क्या कार्टूनिंग भारत में पूर्ण रूप से स्थापित है, या इसे और बढ़ावे की आवश्यकता है?

उत्तर: कार्टूनिंग भारत में स्थापित है या नहीं इस बात पर प्रश्न खड़ा करना शंकर, लक्ष्मण, मिरांडा, सुधीर दर, आबित सुरती, सुधीर तैलंग, केशव सहित अन्य भाषाओँ में काम करने वाले सैंकड़ों कार्टूनिस्टों के काम का अपमान होगा। बढ़ावा देने या प्रोत्साहन की ज़रुरत तो हमेशा रहेगी और ये जिम्मेदारी अख़बारों और उनके संपादकों की पहले बनती है। पिछले कुछ समय में कई अख़बारों में, चाहे वे हिंदी हों या अंग्रेजी, कार्टूनों के कॉलम दरकिनार कर दिए गए। ये बात अखरने वाली है। में उम्मीद करता हूँ उन्हें जल्द ही अपनी गलती का एहसास होगा।

कार्टून वाच की तरह वाह भाई वाह और एक अन्य पत्रिका भी निकलती है लेकिन इनसे कोई खास फर्क नहीं पढ़ रहा। छपे हुए कार्टूनों को ३० या ४० दिन पुनः छापने के बजाए, वे नए कार्टूनिस्टों के ताजा काम छापें तो बेहतर होगा। जमे-जमाए कार्टूनिस्टों को हर साल पुरस्कार देने के बजाए, हर साल राष्ट्रिय स्तर की कार्टून प्रतियोगिता आयोजित की जाये, तो शायद नए कार्टूनिस्ट ज्यादा प्रोसाहित होंगे।

प्रश्न: कार्टूनिंग के अलावा और क्या शौंक है आपके? हमें अपने परिवार के बारे में कुछ बतायिएँ और काम से लौटने पर आप कैसे अपना दिन बिताते है। क्या आपके परिवारजनों ने आपके कार्टूनिंग को करियर बनाने के निर्णय पर आपका विरोद/समर्थन किया था?

उत्तर: गार्डनिंग और कुकिंग। अपना खाली समय, या समय न होने पर भी समय निकल कर, अपने घर पर बने छोटे से गार्डन में पेड़-पौधों के बीच समय बिताना बेहद पसंद है। दूसरा शौक कुकिंग का। अगर कार्टूनिस्ट नहीं होता तो मेरा कोई रेस्टोरेंट या ढाबा जरूर होता। 🙂 काम से लौटने के बाद मेरा दिन बचता ही नहीं, मैं अकसर रात को साढ़े ग्यारह या बारह बजे तक घर पहुंचता हूँ। हाँ ऑफिस जाने के पहले काफी समय होता है क्योंकि मुझे ऑफिस दोपहर में ३ या ४ बजे जाना होता है, इसलिए तब तक का समय अपने बगीचे में या फिर सवा दो साल के बेटे के साथ मस्ती करने में बीतता है।

मेरे कार्टूनिस्ट बनने को लेकर घर वालों को आपत्ति या विरोध का मौका ही नहीं मिला। में अपने स्कूल के समय से कार्टून बना रहा था और हायर सेकेण्डरी की पढाई करते हुए तो मैंने अपनी पहली कार्टूनिस्ट की नौकरी भी कर ली थी। उन्हें पता था कि में इसके अलावा कुछ और करने वाला भी नहीं हूँ। हाँ मेरे दोनों बड़े भाइयों का काफी समर्थन और प्रोत्साहन मुझे मिला।

प्रश्न: आपके ब्लॉग में अधिकतर राजनीतिक व्यंग देखने को मिलता है। क्या वजह है की आप इस शैली में इतनी रूचि रखते हैं? किस राजनीतिक व्यक्ति पर कार्टून बनाना आपको सबसे ज्यादा पसंद है और क्यूँ? आप अपने कार्टून्स को कैसे परिभाषित करेंगे?

उत्तर: कार्टून के बारे में कहा जाता है की यह नकारात्मक कला है, एक प्रकार कि आलोचना होती है, जिसे आप व्यंग के रूप में कार्टून के अन्दर पाते हैं। आप किसी की तारीफ़ मैं व्यंग कैसे कर सकते हैं? जाहिर है व्यंग करने के लिए आपको उसमें कोई बुराई, कोई कमजोरी या कमी ढूंढनी  होगी। हमारे नेताओं में ढेरों बुराइयाँ हैं, हमारी व्यवस्था में कई कमियाँ हैं जिनका सामना हम आएदिन कर रहे हैं, तो स्वाभाविक है कार्टून या व्यंग भी इन्ही सब के बीच से निकल कर आएगा।

पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं होता, हम किसी को नहीं छोड़ते हैं। 🙂 फिर भी मनमोहनसिंह, मायावती और दिग्विजयसिंह ऐसे किरदार हैं जिनपर कार्टून बनाने में ज्यादा मज़ा आता है। मनमोहन सिंह से जुड़ी घटनाएँ और लोग उनपर कार्टून बनाने के लिए भरपूर मसाला देते हैं, जबकि दिग्विजयसिंह और मायावती को में चलता फिरता कार्टून मानता हूँ। इनलोगों के बस मुँह खोलने की देर होती है, जहाँ ये कुछ बोले कि कार्टून तैयार। मेरे कार्टून मेरी अभिव्यक्ति के साधन है। हमारे यहाँ सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। लिखने वाले लिखकर, बोलने वाले बोलकर और में बनाकर अपने विचार व्यक्त करता हूँ।

प्रश्न: आपके कार्टून्स से कितने सारे लोग हँसते है और प्रेरित होते है। लेकिन आप किसके कार्टून्स से हँसते है;आपके पसंदीदा भारतीय कार्टूनिस्ट कौनसे है और क्यूँ? हम जानना चाहेंगे की आपको अपनी कार्टून्स के संग्रह से, कौनसा कार्टून सबसे ज्यादा पसंद है? एक अच्छे कार्टूनिस्ट बन्नने के लिए, क्या गुण होने ज़रूरी है?

उत्तर: कार्टून में दूसरों को देख देख कर ही सीखा हूँ, पुराने कार्टूनिस्ट में मुझे लक्ष्मण बेहद पसंद है और अभी की बात की जाये तो आउटलुक के संदीप, डी.एन.ए के मंजुल और मिड डे के सतीश आचार्य देश के बेहतरीन कार्टूनिस्ट हैं, इनमें मुझे सर्वाधिक संदीप के कार्टून पसंद हैं, उनका काम वाकई लाजवाब है। अपने खुद के कार्टून पसंद करना स्वतः सुखाय वाली स्थिति है और में उसमें नहीं आना चाहता। मैं अब भी सीखने के दौर से गुज़र रहा हूँ और रोज कार्टून बनाने के बाद अगले दिन लगता है में इससे बेहतर कर सकता था। हाँ मेरे पसंदीदा विषय जरूर रहे हैं जिनपर कार्टून बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता। अफ़ज़ल गुरु की फांसी, कसाब कि खातिरदारी, कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, मायावती की मूर्तियाँ और लोकपाल बिल मेरे पसंदीदा विषय रहे और इन पर बनाये मेरे कार्टून भी काफी सराहे गए।

जो लोग कार्टूनिंग से जुड़ना चाहते हैं उनके लिए यही कहूँगा कि वे यदि अख़बार के लिए कार्टूनिस्ट बनना चाहते हैं तो पढ़ें, खूब पढ़ें। हर खबर पर नज़र रखें, खुद को अपडेटेड रखे, जब किसी कार्टून आइडिया पर काम करें तो उस पर बार-बार सोचें। सबसे पहले आने वाले आइडिया अक्सर प्राइमरी स्टेज के होते हैं और कॉमन होते हैं। उन्हें छोड़कर उसके बाद से शुरू करें। आपको मिले समय का अधिकाधिक उपयोग कांसेप्ट और आइडिया पर करें चित्रांकन को इसके बाद रखें। बुरी ड्राइंग के साथ भी एक कार्टून अच्छा हो सकता है लेकिन बुरे कंटेंट के साथ कोई कार्टून अच्छा नहीं हो सकता चाहे उसमें कितनी भी अच्छी ड्राइंग हो।

प्रश्न: कई सालों पहेले कार्टून नेटवर्क, कॉमेडी शो, वगेरह नहीं होते थे। चाचा चौदरी, मालगुडी, अमर चित्रकथा, उन दिनों यह सब भाया करता था। तब से अब तक, क्या परिवर्तन आपने ग़ौर किए है कार्टूनिंग में? क्या वे परिवर्तन उचित है? अगर आपको एक कार्टून पात्र जैसे रहना हो, तो आप किसे चुनेंगे और क्यूँ? इसी विषय पर एक कार्टून हो जाये! 🙂

उत्तर: प्राण की कॉमिक्स दुनिया ही अलग थी। मुझे याद है बाकी दिनों को छोड़कर हमें सिर्फ गर्मी की छुट्टियों में ही कॉमिक्स पढ़ने को मिलती थी, लिहाज़ा वो दो महीने अपनी दुनिया ही अलग होती थी। में आज भी मौका मिलने पर वे कॉमिक्स बहुत चाव से पढ़ता हूँ। बजाय किसी कार्टून पात्र की तरह रहने के, में तो सोचता हूँ काश कि सारी दुनिया ही उस कॉमिक्स कि तरह हो जाये। सीधे और साफ़ सुथरे दूर दूर बने मकान, जितनी जरूरत हो द्रश्य में सिर्फ उतने ही केरेक्टर, अजीबोगरीब गाड़ियाँ, छोटे छोटे, गोलू-मोलू से आपके पडोसी और गुंडे बदमाश भी गब्बर, साम्भा, घसीटा और ढक्कन जैसे क्यूट। कल्पना कीजिये क्या दुनिया होगी वो भी। 🙂 लेकिन अफ़सोस! जितने बदलाव हमारी इस दुनिया में हुए हैं, उतने ही कार्टून की दुनिया में भी। अब सबकुछ जैसे मशीनी हो गया है, एनीमेशन कि विभिन्न तकनीकों से बने इन कार्टूनों में वो मासूमियत नहीं दिखाई देती है। खुद डिज्नी के पात्र बस ब्रांड बनकर रह गए हैं।

प्रश्न: क्या कभी आपका कोई कार्टून विवाद में घिरा है? आपको अगर मौका मिले तो क्या आप अपने कार्टून्स की एक किताब प्रकाशित करना चाहेंगे?

उत्तर: भड़काऊ, विवादित और संवेदनशील मुद्दों पर कार्टून बनाने में मेरी रूचि नहीं रही, शायद इसलिए विवाद भी नहीं हुआ। मैं नेताओं और राजनीति पर कार्टून बनाता रहा हूँ और उनकी चमड़ी इतनी मोटी हो गयी है कि उन्हें कोई फर्क ही नहीं पढता। यदि मौका मिला तो किताब अवश्य प्रकाशित करना चाहूँगा लेकिन सिर्फ अपने कार्टून्स की नहीं, कार्टून तो सब देख ही लेते हैं, मैं उसके पीछे कहानियां भी शामिल करना चाहता हूँ।

प्रश्न: क्या आप अपने ब्लॉग को प्रमोट करते है? आप कौनसे प्रमोशनल माध्यमों का उपयोग करते है?

उत्तर: जी हाँ। मेरे ब्लॉग पर आने का उद्देश्य ही अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचना था। और बगैर अपने ब्लॉग को प्रमोटे किये उन तक पहुँचना आसान नहीं। अपने ब्लॉग के प्रमोशन के लिए एग्रीगेटर सबसे आसान और बेहतरीन माध्यम होता है। इसके अलावा मेरा सोशल नेटवर्क इसमें अहम् भूमिका निभाता है।

प्रश्न: कितना ज़रूरी है एक ब्लॉगर का अपने पाठकों से संवाद करना? क्या आप अपने सारे कमेंट्स का उत्तर देते है?

उत्तर: निश्चिंत ही अपने पाठकों से संवाद बेहद जरूरी है और फायदेमंद भी, ब्लोगिंग के फायदों में एक यह भी है कि आप आपने पाठकों से सीधा संवाद कर सकते हैं। कई बार दिलचस्प बहस मैंने ब्लॉगर के कमेन्ट बॉक्स में देखी हैं। यहाँ तक कि कई पोस्ट पर टिप्पणियां उस पोस्ट से ज्यादा अच्छी होती है। मेरे मामले में अपने पाठकों से सीधे संवाद करना थोडा कठिन रहता है।

मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट मोडरेशन एक्टिव है और में अपनी पोस्ट अक्सर सुबह ११ बजे तक पोस्ट कर देता हूँ, उसके बाद कई बार रात को ऑफिस से आने के बाद या फिर अगले दिन सुबह सारे कमेंट्स  को अप्रूव कर पाता हूँ। चूँकि ब्लॉगर में वर्डप्रेस की तरह हर कमेन्ट को रिप्लाई करने की सुविधा नहीं है इसलिए १२ या २४ घंटे बाद मैं कमेंट्स पर रिप्लाई करूँ भी तो मुझे यह पता नहीं होता कि कमेन्ट देने वाले को उसका पता भी चलेगा कि नहीं। लिहाज़ा बजाय सारे कमेन्ट का उत्तर देने के, मैं रोचक, अच्छे कमेंट्स या जिनमें उत्तर देने की जरूरत होती हैं, उन्हें ईमेल या सोशल नेटवर्क के माध्यम से संपर्क कर संवाद कर लेता हूँ।

प्रश्न: आपके लिए ब्लोगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू कौनसा है?

उत्तर: मेरे लिए ब्लोगिंग का सबसे संतुष्टिदायक पहलू यह है कि इसके माध्यम से मेरे कार्टून देश और दुनिया के हर कोने में देखे जा सकते हैं। अख़बार के प्रसार क्षेत्र की सीमा होती, है जबकि ब्लॉग या इन्टरनेट कि नहीं। दूसरी अच्छी बात यह कि आप अपने पाठकों से सीधे संपर्क में रहते हैं। तीसरा यह कि अन्य माध्यमों की तरह आप संपादक की सहमती के लिए बाध्य नहीं होते।

प्रश्न: भारतीय ब्लोग्स का एक विश्व स्तर पर क्या मूल्य है? अपने पसंदीदा ५ ब्लोग्स बताइए।

उत्तर: विश्व स्तर पर भारतीय ब्लोग्स का मूल्य वही है जो भारतीय विचारों और भारतीय लेखन का, और इसमें कोई दो राय नहीं कि इस मामले में हम काफी सम्रद्ध हैं। नया लिखने वाले तो उल्लेखनीय काम कर रहे हैं, ब्लॉग के माध्यम से पुराना साहित्य भी इन्टरनेट पर उपलब्ध हो रहा है। जहाँ दुनिया भर में ब्लॉग का निजी वेबसाइट या डायरी की तरह उपयोग किया जा रहा है, वहीँ हमारे यहाँ ये एक अलग मीडिया की तरह विकसित हो रहा है।

मेरे पसंदीदा ब्लॉग:

प्रश्न: आप क्या सुझाव देंगे उन व्यक्तियों को जो ब्लोगिंग की शुरुआत करना चाहते है?

उत्तर: ब्लोगिंग शुरू करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह सिर्फ एक ईमेल अकाउंट बनाने जितना आसान है, लेकिन मुश्किल इसे जारी रखने की है। कुछ एग्रीगेटर्स के आंकड़े बताते हैं कि रोज़ सैंकड़ों कि तादाद में नए ब्लॉग बनाए जा रहे हैं लेकिन कुछ दिनों या महीनों बाद वे उपडेट नहीं होते। अगर हिंदी ब्लोग्स कि ही बात करें तो जब मैंने शुरुआत की थी तब कुछ ८०० के करीब हिंदी ब्लोग्स थे और उनमें से अधिकाँश नियमित अपडेट होते थे। लेकिन लोकप्रियता बढने के साथ ही ब्लोगों कि संख्या भी बढ़ी और शायद वो आज लाखों में होगी, लेकिन दुखद यह है जितने ब्लॉग बने हैं उनमें अधिकांश, सालों या महीनो से अपडेट नहीं हुए।

लोग ब्लॉग बना लेते हैं लेकिन थोड़े दिन पाठकों के आभाव में उसे उपडेट करना बंद कर देते हैं। इसका बेहतर उपाय है कि आप ब्लॉग बनने के साथ उसे अपने पाठकों तक भी पहुँचाए। एग्रीगेटर्स से जुड़ें, अन्य ब्लॉग पर कमेन्ट कर उनसे जुड़ें, अपना ब्लॉग समय समय पर अपडेट करें। समय के अनुसार और पाठकों की रूचि के अनुरूप पोस्ट करें। थोड़ी तकनिकी जानकारी के साथ अपने ब्लॉग को सर्च इंजिन से जुड़ने लायक बनायें। अपने ब्लॉग के विषय का ठीक से वर्गीकरण करें, सही ढंग से लेबलिंग करें, आप किसी खास विषय पर ब्लॉग करते हैं तो अपने ब्लॉग में उस विषय से जुड़े लोकप्रिय कीवर्ड्स का प्रयोग अवश्य करें जिन्हें लोग सर्च इंजिन पर सर्च कर आपके ब्लॉग तक पहुँच सकें।

प्रश्न: क्या ब्लोगिंग एक कमाने का जरिया बन सकता है? क्या आपको ब्लोगिंग से मौद्रिक लाभ होता है?

उत्तर: जी बिलकुल। ब्लॉग के माध्यम से आप ही लोगों तक नहीं पहुँचते हैं बल्कि लोगों का भी आप तक पहुँचना आसान हो जाता है। और आप व्यवसायिक रूप से लिखते हैं, या किसी विशेष विषय, या प्रोडक्ट से सम्बंधित ब्लॉग लिखते हैं, तो निश्चित ही ब्लॉग के माध्यम से आपके ग्राहक भी आप तक पहुँच सकते हैं। वैसे ब्लॉग या वेब पर कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया, है आपके ब्लॉग या वेब पर लगने वाले विज्ञापन।

लोग आपके ब्लॉग पर विज्ञापन देने आए इसके लिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके ब्लॉग पर भारी मात्रा में पाठक पहुँचते हो लेकिन औसत पाठक या ट्राफिक वाले ब्लॉग के लिए गूगल की एडसेंस सेवा कमाई का अच्छा साधन है। रोचक या लोगों कि रूचि के विषय पर ब्लॉग पोस्ट लिखाकर और उस पर एडसेंस के विज्ञापन लगाकर आप खासी कमाई कर सकते हैं। अब तो गूगल एडसेंस की तर्ज़ पर ही कई अन्य सेवाएँ भी है जो आपको कमाई का मौका देती हैं। मुझे गूगल के विज्ञापनों से तो कमाई हो ही रही है, साथ ही साथ कार्टून या डिजाईन से जुड़े काम भी मुझे ब्लॉग के माध्यम से काफी मात्रा में मिलते हैं।

प्रश्न: आप के अनुसार, ब्लोगिंग का क्या भविष्य है?

उत्तर: जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, हमारे यहाँ ये अलग मीडिया की तरह विकसित हो रहा है, ऐसे में इसके भविष्य को लेकर शंकाएं बेकार है। हमारे यहाँ जबकि इन्टरनेट ही अभी शुरुआती दौर में है और उसमें भी ब्लोगिंग मात्र कुछ प्रतिशत ही हो रही है, तो जैसे जैसे इन्टरनेट का विस्तार होगा ब्लोगिंग का भी प्रभाव बढेगा ही।

प्रश्न: चलिए, अब हमें अपनी कुछ प्रिय चीज़ों से परिचित कराएँ:

रंग: ब्लेक
चलचित्र: सिनेमा हाल में फिल्म देखे सालों हो गए! टीवी चैनलों पर मूड के अनुसार होलिवुड कि फिल्मों से लेकर साउथ की सी ग्रेड डब फिल्में तक देख डालता हूँ।
टेलिविजन शो: पुराने की लिस्ट लम्बी है। लेकिन साराभाई वर्सेस साराभाई मुझे बेहद पसंद था। उसके बाद अब तक कोई नहीं।
किताब: रागदरबारी।
दिन का समय: जब सोने को मिल जाये। 🙂
राशी: मिथुन

धन्यवाद कीर्तीश जी हमारे पहले हिंदी इंटरव्यू का हिस्सा बनने के लिए। हमें आशा है की हमारे सभी पाठकों को यह इंटरव्यू पसंद आया। कृपया कमेंट्स में अपने विचार व्यक्त करें और हमें प्रोत्साहित करें।


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18 Replies to “Interview with Kirtish Bhatt”

  1. कीर्तिश मेरे फेवरिट कार्टूनिस्ट हैं.
    बहुत बढ़िया लगा कीर्तिश का इंटरव्यू पढ़कर.

  2. अच्छा लगा पढ़कर. रचनाकार के रचनाकर्म की जानकारी तो आमतौर पर पाठक को हो जाती है पर रचनाकार के बारे में व्यक्तिगत बातों की जानकारी प्राय: साखात्कार से ही मिलती है. धन्यवाद.

  3. Thank you very much Kirtish Sir….Ye interview padh kar kaafi kuch samajh aata haai ki hw a cartoonist

  4. ब्लॉगअड्डा का पहला हिंदी इंटरव्यू और कीर्तिश जी को पढ़ कर अच्छा लगा| ब्लॉग भी खूब है|

  5. Dear Kirtish,
    It is indeed nice to have read your interview as a blogger and a cartoonist. You are doing a good job and it is always pleasure to read and see your cartoons on contemporary issues. Wish you good luck and many more all sucess in life.

  6. कार्टूनिस्ट का सरकार कुछ नहीं उखाड़ सकती मगर कार्टूनिस्ट सरकार उखाड़ सकता है 🙂

    अच्छा लगा रहा है, भाई कार्तिश का साक्षात्कार पढ़ कर.

  7. यार अपना फोटू तो प्राण (चाचा चौधरी वाले) टाइप का कुछ लगाते… 🙂

  8. …..मतलब कार्टूनिस्ट चाह ले ….तो क्या नहीं कर सकता ?
    बढ़िया इंटरव्यू !
    बधाई जी बधाई !
    ब्लॉगअड्डा को भी किसी हिन्दी ब्लॉगर का इंटरव्यू पढवाने के लिए हिन्दी में शुक्रिया !

  9. Amazing, that’s really interesting to know a life of a cartoonist…it was really nice to know about his working and more amazing is a first Interview in Hindi of BlodAdda.

  10. कीर्तीश जी तो ब्लॉगजगत के लोकप्रिय कार्टूनिस्ट हैं, उनके बारे में विस्तार से जानकर अच्छा लगा।

    हिन्दी में ब्लॉग शुरु करने पर हार्दिक बधाई। आशा है भविष्य में और भी अच्छे हिन्दी ब्लॉगरों के इंटरव्यू प्रकाशित करेंगे।

  11. blog adda ki team ko bahut bahut badhai. aapane hindi bhasha main iterview ki shuruaat ki. hindi bhashi log pahale isiliye nahi jud pate the ki interview samajh main nahi aata tha. pahali baar laga ki yah hamare liye hai. bahut badhai. bhatt ji se mulakat main maja agaya.

  12. @शिव कुमार @प्रतीक @संजय @विवेक – हमें ख़ुशी है आपको इंटरव्यू पसंद आया। 🙂
    @काजल कुमार – सही कहा आपने काजल जी। हमारा पहला हिंदी साक्षात्कार पढ़ने के लिए शुक्रिया।
    @ प्राइमरी के मास्साब – खूब कहा आपने। कार्टूनिस्ट चाहें तो क्या नहीं कर सकते! 🙂 बधाई के लिए शुक्रिया।
    @इ-पंडित – अच्छा लगा जानकार की आपको इंटरव्यू पसंद आया। आपका सहयोग और बढ़ावा साथ रहा तो अवश्य ही हम आगे भी इस शैली में और अनोखे ब्लोगर्स को प्रकाशित करेंगे। 🙂 इंटरव्यू पढ़ने और प्रोत्साहन देने के लिए शुक्रिया।
    @शिवराज – बहुत ख़ुशी है हमें की आपको भट्ट जी का साक्षात्कार अच्छा लगा। हमारी यही कोशिश रहेगी की हम अपने हिंदी पाठकों के लिए और भी ऐसे इंटरव्यू प्रकाशित करें। बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। 🙂

    @Satish Happy to have you back here. 🙂 Glad you enjoyed the interview.
    @SRAyyangar Glad you liked it.
    @Himanshu Thank you. 🙂 This is just the start. We have more coming up.

  13. कीर्तिश भाई के क्या कहते मैं उन्हें चौथा संसार के जमाने से जानता हूं, जिसने सरल-सहज हैं, उतने ही प्रहार करने वाले कार्टुन बनाते हैं। मैंने कई साल तक उनके एक कार्टुन की कटिंग संभालकर रखी थी। सदन में जूते चल रहे थे। कीर्तिश भाई ने कार्टुन बनाया था…छी…छी सदन का स्तर कितना गिर गया है। मैंने जूता उछाला और उसे कोई लेकर चला गया। तबादलों के दौरान समान रखने रखाने में वो डायरी और काटुर्न दोनों खो गए।
    dharmendrabchouhan.blogspot.com

  14. कीतिश अच्छे काटूर्निस्ट के साथ-साथ धीर-गंभीर व अच्छे व्यक्तित्व के धनी भी है…मैंने इन्हें खामोश चिन्तन में अक्सर डूबा पाया है…

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